SIR विवाद पर चुनाव आयोग का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा, कहा- फॉर्म-6 में नहीं किया कोई संशोधन

Editor
6 Min Read

 नई दिल्ली

चुनाव आयोग ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक जवाबी हलफनामा दायर किया। इसमें आयोग ने अपने कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया का बचाव किया है।

चुनाव आयोग ने अनियमितताओं के आरोपों को खारिज कर दिया और उस याचिका के आधार पर ही सवाल उठाए, जिसमें आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी।

याचिका पूरी तरह समाचार रिपोर्ट पर आधारित- चुनाव आयोग

'बार एंड बेंच' के अनुसार, चुनाव आयोग ने कहा कि यह याचिका पूरी तरह से केवल एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी द्वारा सर्वसम्मति से मंजूर किए गए इस हलफनामे में कई मुद्दों पर जवाब दिया गया है। 

इनमें आयोग की आंतरिक निर्णय लेने की प्रक्रिया, मतदाता पंजीकरण फॉर्म में कथित बदलाव, नामों को हटाना और मतदाता डेटाबेस के कामकाज से जुड़ी चिंताएं शामिल हैं।

यह जवाब तब आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी और INDI गठबंधन के अन्य नेताओं द्वारा दायर एक याचिका पर चुनाव आयोग मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया था।

याचिकाकर्ताओं ने आधिकारिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करने, मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया का स्वतंत्र ऑडिट कराने, हटाए गए मतदाताओं की बूथ-वार सूची देने और यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि बिना किसी नोटिस या अपनी बात रखने का मौका दिए पात्र मतदाताओं के नाम न हटाए जाएं।

चुनाव आयोग ने अपने 15-बिंदुओं वाले जवाब में क्या कहा?

  •     हलफनामे को तीनों सदस्यों – मुख्य चनाव आयुक्त (CEC) और दोनों चुनाव आयुक्तों ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी है।
  •     तीनों SIR आदेश (जून 2025, अक्टूबर 2025, मई 2026) आयोग के सर्वसम्मत फैसले थे।
  •     फाइल आगे बढ़ने के दौरान CEC या EC द्वारा दी गई टिप्पणियां, सवाल या सुझाव, आयोग के 'फैसले' नहीं माने जाते।
  •     फाइलें पहले एक EC के पास जाती हैं, फिर दूसरे EC के पास, और अंत में CEC के पास। बहुत जरूरी मामलों में, मंजूरी इलेक्ट्रॉनिक तरीके से ली जाती है और बाद में उसे फाइल में दर्ज कर लिया जाता है।
  •     अगर कोई अधिकारी अपनी तय शक्तियों से बाहर जाकर आदेश जारी करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
  •     28 जुलाई का काम बांटने वाला आदेश प्रतिनियुक्ति पर आए एक अतिरिक्त सचिव ने जारी किया था। अगले ही दिन दोनों EC ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा। 30 जुलाई को EC के संयुक्त निर्देश के बाद, उस आदेश को कभी लागू नहीं किया गया।
  •     फॉर्म 6 में कोई बदलाव (संशोधन) नहीं किया गया है। इसमें बदलाव करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। SIR घोषणा-पत्र एक अलग दस्तावेज है।
  •     आयोग ने माना है कि ऑनलाइन दिखने वाली जानकारी को 'संशोधन' के रूप में समझा जा सकता था। 21 अक्टूबर से, ऑनलाइन आवेदन को फॉर्म 6 और घोषणा-पत्र में बांट दिया जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे फिजिकल फॉर्म में होता है।
  •     जिन मतदाताओं का नाम सूची में नहीं है, उन्हें सुनवाई के लिए आने की जरूरत नहीं है। BLO उनके घर जाकर दस्तावेज ले लेंगे। सुनवाई केवल बहुत खास मामलों में ही होगी, और वह भी ऑनलाइन होने को प्राथमिकता दी जाएगी।
  •     ECINet: ERO के आदेश के बिना इसमें कोई नाम न तो जोड़ा जा सकता है और न ही हटाया जा सकता है। नियमों का पालन हो रहा है या नहीं, यह जांचने के लिए IIT और IISc के विशेषज्ञों की एक समिति बनाई गई है।
  •     गोवा: सूची से छूटे 97 मतदाताओं में से 88 पहले ही पंजीकृत हो चुके थे, 6 विदेश में थे, और 3 के पास पुर्तगाली पासपोर्ट थे।
  •     पश्चिम बंगाल में मतदाताओं को शामिल करने के खिलाफ अपीलें, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत CEO, पश्चिम बंगाल के अधिकारियों द्वारा दायर की गई थीं। "इन मामलों को आयोग के सामने नहीं लाया गया था"।
  •     CEC को रोकने या उन पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका कानूनी रूप से मान्य नहीं है। CEC को केवल उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जिससे सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है।
  •     आयोग ने कभी भी किसी आंतरिक नोट या फाइल को मीडिया में जारी नहीं किया, और न ही ऐसा करने की अनुमति दी।
  •     EVM पर बार-बार उठाए गए सवालों को सुप्रीम कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है।
Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

YouTube Reporters Support Directors Live