बिहार माओवादमुक्त, फिर भी अलर्ट; पूर्व माओवादियों और उनके परिवारों पर पुलिस की नजर

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पटना
 बिहार को भले ही माओवादमुक्त घोषित कर दिया गया हो, लेकिन माओवादी दोबारा संगठित न हो सकें, इसके लिए पुलिस मुख्यालय सतर्क है। जेल से रिहा होने वाले पूर्व माओवादियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है।

पुलिस की टीम सिर्फ पूर्व माओवादियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उनके परिवार के सदस्यों से भी संपर्क कर रही है।

इस दौरान परिवार की आर्थिक स्थिति, बच्चों की शिक्षा और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों की जानकारी ली जा रही है।

पूर्व माओवादियों की वर्तमान सोच और मुख्यधारा में उनके समायोजन को लेकर भी फीडबैक जुटाया जा रहा है। पुलिस का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति दोबारा उग्रवादी गतिविधियों से न जुड़े।

परिवार की आर्थिक स्थिति और बच्चों की पढ़ाई पर भी नजर
पुलिस और प्रशासन की ओर से पूर्व माओवादियों के परिवारों से संवाद कर उनकी जरूरतों और समस्याओं को समझने का प्रयास किया जा रहा है।

परिवार की आर्थिक स्थिति, बच्चों की शिक्षा और रोजगार से जुड़े पहलुओं की जानकारी जुटाई जा रही है। इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि पूर्व माओवादी मुख्यधारा के जीवन में किस हद तक समायोजित हो चुके हैं।

पुलिस का मानना है कि संवाद और पुनर्वास के जरिए दोबारा उग्रवादी गतिविधियों की आशंका को कम किया जा सकता है। इस कवायद के तहत पुलिस की स्थानीय इकाइयों और खुफिया तंत्र को भी सतर्क रखा गया है।
पूर्व में नक्सल प्रभावित रहे इलाकों में विशेष निगरानी जारी है।

झारखंड से सटे इलाकों में सक्रिय संगठनों पर भी नजर
माओवादियों से अलग होकर बने संगठनों की गतिविधियों पर भी निगरानी बढ़ा दी गई है। बिहार से सटे झारखंड के जिलों में सक्रिय पीएलएफआइ और जेजेएमपी जैसे संगठनों की गतिविधियों की जानकारी जुटाई जा रही है।

सीमावर्ती क्षेत्रों में इनके संभावित प्रभाव और आवाजाही को लेकर खुफिया तंत्र सतर्क है। पुलिस मुख्यालय के स्तर से इन संगठनों से जुड़े इनपुट का लगातार विश्लेषण किया जा रहा है।

किसी भी नए नेटवर्क या संगठनात्मक गतिविधि की जानकारी मिलते ही संबंधित जिलों को अलर्ट किया जा रहा है। उद्देश्य यह है कि बिहार में उग्रवादी संगठनों को फिर से पैर पसारने का मौका न मिले।

ईंट-भट्ठा से खनन तक, आर्थिक स्रोतों की हो रही पड़ताल
बिहार एसटीएफ के अनुसार, उग्रवादी संगठनों के संभावित आर्थिक स्रोतों पर भी विशेष निगरानी रखी जा रही है। इसमें ईंट-भट्ठा, अफीम की खेती, ठेकेदारी और खनन जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

खुफिया तंत्र यह पता लगाने में जुटा है कि इन क्षेत्रों से किसी प्रकार की लेवी या अवैध वसूली तो नहीं की जा रही है। इसके लिए विभिन्न स्तरों से सूचनाएं एकत्र कर खुफिया रिपोर्ट तैयार की जा रही है।

संदिग्ध आर्थिक गतिविधियों और पुराने नेटवर्क से जुड़े लोगों पर भी नजर रखी जा रही है। पुलिस का फोकस उग्रवादी संगठनों की आर्थिक रीढ़ को मजबूत होने से रोकने पर है।

63 पूर्व माओवादियों को मिलेगा पुनर्वास नीति का लाभ
पुलिस-प्रशासन के समक्ष आत्मसमर्पण करने वाले 63 लोगों को राज्य सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति का लाभ देने की मंजूरी मिल चुकी है।

पुनर्वास के जरिए इन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की प्रक्रिया चल रही है। पूर्व में नक्सल प्रभावित रहे गांवों में विकास कार्यों पर भी जोर दिया जा रहा है।

इन इलाकों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रशासन का मानना है कि विकास और पुनर्वास के जरिए उग्रवाद की जमीन को कमजोर किया जा सकता है। इसी रणनीति के तहत सुरक्षा के साथ सामाजिक और आर्थिक पहलुओं पर भी काम किया जा रहा है।

22 से शून्य जिले, अब केंद्रीय बलों के कैंप हटाने की तैयारी
राज्य में वर्ष 2013 में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों की संख्या 22 थी, जो अब घटकर शून्य रह गई है। हालांकि, दोबारा माओवादी गतिविधियां शुरू न हों, इसके लिए केंद्र सरकार ने चार जिलों को लेगसी और थ्रस्ट जिलों के रूप में चिह्नित किया है।

इनमें औरंगाबाद, गयाजी, जमुई और लखीसराय शामिल हैं।
इन जिलों में केंद्रीय बलों की तैनाती के साथ सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। वर्तमान में मौजूद 24 केंद्रीय बलों के कैंप को योजनाबद्ध तरीके से हटाने के लिए डी-इंडक्शन प्लान तैयार किया जा रहा है। साथ ही माओवादियों द्वारा पूर्व में लूटे गए हथियारों और अन्य सामग्री की बरामदगी के प्रयास भी जारी हैं।

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