World Tourism Day: झारखंड की होड़ोपैथी बनेगी पर्यटन की नई पहचान, ग्रामीणों को रोजगार

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रांची
 झारखंड के आदिवासी समाज के पास हजारों साल से संरक्षित अपनी चिकित्सा पद्धति है। राज्य में पर्यटन के विकास की योजनाओं के साथ पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को जोड़ने पर राज्य सरकार लंबे समय से काम कर रही है।

राज्य के वनों में वेलनेस प्रोडक्ट के लिए उपयोगी वनस्पति की पूरी श्रृंखला उपस्थित है। संताल परगना में मलूटी, देवघर और गिरिडीह के धार्मिक पर्यटन के साथ होड़ोपैथी (आदिवासी चिकित्सा) को जोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में अर्थव्यवस्था का नया आधार तैयार हो सकता है।

संताली और मुंडारी भाषा के शब्द होड़ोपैथी को विश्वभर में एथनो मेडिसन के तौर पर मान्यता दी जाती है। पेडों की छाल, जड़ और दूसरे वनस्पतियों के उपयोग से हड्डियों की मजबूती, नस और चर्मरोग का आसान उपचार किया जाता है।

छोटानागपुर के कई हिस्सों में जलप्रपात देखने के लिए देशभर से लोग आते हैं। यहीं के जंगलों में औषधीय पौधे भी मिलते हैं। ऐसे में केरल के आयुर्वेदिक उपचार की तरह ही झारखंड के आदिवासी पारंपरिक चिकित्सा का समन्वय राज्य के पर्यटन को नई पहचान दे सकता है। रांची से सटे पुरुलिया के जंगलों में रहने वाले कई परिवार ऐसे प्रयोग से जुड़े हैं।

आयुष में शामिल हो सकता है होड़ोपैथी
पर्यटन के साथ स्वास्थ्यप्रद सेवाओं को जोड़ने के लिए झारखंड सरकार होड़ोपैथी को आयुष के तहत संबद्ध कराने का प्रयास कर रही है। संताली भाषा में ओलचिकी लिपि में होड़ोपैथी के दस्तावेज मौजूद हैं।

राज्य सरकार इनके संरक्षण के साथ इन्हें उपयोगी बनाने में लगी है। आदिवासी युवाओं को इसकी जानकारी देकर पर्यटन स्थलों के पास सेंटर खोलने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

    झारखंड के आदिवासियों के पास पारंपरिक तौर पर अपनी चिकित्सा पद्धति है। प्रत्येक आदिवासी घर में वनों से मिलने वाली वनस्पति को औषधि बनाने की तकनीक मौजूद है। इसे पर्यटन से जोड़कर देशभर में प्रचार-प्रसार करने की आवश्यकता है। यह ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर लेकर आएगा। -डॉ. वेंकटेश कात्यायन पांडेय, आयुर्वेदाचार्य

 

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