भोजशाला केस क्यों है अयोध्या-काशी से अलग? मां सरस्वती की रहस्यमयी मूर्ति से जुड़ी धार से लंदन तक की पूरी कहानी

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भोजशाला केस क्यों है अयोध्या-काशी से अलग? मां सरस्वती की रहस्यमयी मूर्ति से जुड़ी धार से लंदन तक की पूरी कहानी
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धार

सौ बात की एक बात ये कि भोजशाला पर कोर्ट के फ़ैसले की ख़बर तो पब्लिक ने सुन ली कि हाई कोर्ट ने उसको मां सरस्वती का मंदिर माना है, लेकिन ज़्यादातर लोग मां सरस्वती की उस मूर्ती का रहस्य नहीं जानते जो माना जाता है कि वहां हुआ करती थी. कहां और क्या है वो मूर्ति जो मिली भोजशाला में? धार के लोग भले ही कहानी जानते हों लेकिन बाक़ी जगहों के लोगों को ज़्यादा नहीं पता है. और ये भी ज़्यादा जानकारी नहीं है कि ये केस अयोध्या, काशी या मथुरा वाले मामले से अलग था. अब भी वैसे ये हाई कोर्ट का फ़ैसला है और मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट तो शायद जाएगा ही. तो अभी हाई कोर्ट ने इसे मां सरस्वती का मंदिर बता दिया है, मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट गया तो वहां से भी फ़ैसला आ जाएगा, लेकिन क्या राजा भोज की स्थापित मां वाग्देवी यानी मां सरस्वती की मूर्ति अब भी है? है तो कहां है? वो कहानी भी जाननी ज़रूरी है। 

धार से लंदन तक की कहानी
मध्य प्रदेश का धार परमार राजवंश की राजधानी हुआ करती थी आज से कोई 1000 साल पहले. वहां पर है ये भोजशाला जिसको लेकर सारा विवाद था. भोजशाला भी कहते हैं, मां वाग्देवी का मंदिर भी कहते हैं और मुसलमान इसको कमाल मौला की मस्जिद कहते आ रहे थे. लेकिन ये इमारत बाक़ी मंदिरों-मस्जिदों की तरह नहीं है क्योंकि ये प्राचीन धरोहरों का संरक्षण करने वाली एजेंजी ASI के अधीन है. आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के संरक्षण में है. यानी पुरातत्व विभाग. वो इसकी देखरेख करता है. और आज से नहीं. 1909 से. यानी 100 साल से भी ज़्यादा पहले से, अंग्रेज़ों के ज़माने से। 

राजभोज और भोजशाला की कहानी
इसमें मंगलवार को हिंदुओं को पूजा करने की इजाज़त थी और शुक्रवार को मुसलमानों को. लेकिन विवाद बना हुआ था और फिर एक सायंटिफ़िक सर्वे करवाया गया था जिसकी रिपोर्ट दो साल पहले कोर्ट को दी गई थी और उसी के आधार पर फ़ैसला आया है. इमारत जो है वो 11वीं सदी की मानी जाती है. हिंदू पक्ष का मानना है कि ये सरस्वती मंदिर था जो परमार राजवंश के राजा भोज ने बनवाया था. राजा भोज का शासन था साल 1000 से 1055 तक. और राजा भोज के राज में संस्कृत का बहुत अध्ययन होता है. तो हिंदू पक्ष मानता है कि यहां मां वागदेवी यानी सरस्वती का मंदिर स्थापित किया गया था और ये जो पूरा कॉम्प्लेक्स जो था जिसको भोजशाला कहते हैं, ये संस्कृत अध्ययन का बड़ा केंद्र हुआ करता था. जिसको बाद में 14वीं सदी में अलाउद्दीन खिलजी से लेकर 15वीं सदी में महमूद शाह खिलजी तक ने तोड़ा और बर्बाद किया और मंदिर की जगह पर कमाल मौला मस्जिद बना दी गई थी। 

भोजशाला पर मुसलमानों की क्या दलील
मुसलमानों का पक्ष ये था कि ये सूफ़ी संत कमालुद्दीन चिश्ती की दरगाह थी, जिनकी मृत्यु 13वीं सदी में धार में ही हुई थी और उनकी मज़ार के पास ही ये मस्जिद बन गई थी. ब्रिटिश राज के टाइम धार एक रियासत हुआ करती थी और महाराजा सर उदाजी राव पुआर द्वितीय के शासनकाल में 1909 में इस कॉम्प्लेक्स को अंग्रेज़ों की ASI के संरक्षण में दे दिया गया था. आज़ादी के बाद 1951 में इसको मॉन्युमेंट ऑफ़ नैशनल इंपॉर्टेंस, राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित कर दिया गया था. और फिर इस घटनाक्रम में सबसे अहम फ़ैसला जो हुआ था वो हुआ था 2003 में जब ASI ने ये व्यवस्था की कि मंगलवार को हिंदू पूजा कर सकेंगे और शुक्रवार को मुसलमान. इस व्यवस्था से दोनों पक्ष ख़ुश नहीं थे और मामला अदालत में चल रहा था जिसपर हाई कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि ये मंदिर ही था और मुसलमानों को नमाज़ पढ़ने का अधिकार नहीं होगा. लेकिन जो समझने वाली बात है वो ये कि ये केस बाक़ी मामलों से अलग कैसे था। 

मां सरस्वती के सबूत
एक तो इस मामले में कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं था. दूसरा ये अग्रेज़ों के ज़माने से ही पुरातत्व विभाग के पास था. और तीसरा ये कि इस विवाद ने भले ही 1992 में अयोध्या में ढांचा गिराये जाने के बाद तूल पकड़ा हो लेकिन ये विवाद 1902 से चला आ रहा था. 2024 में जो ASI का सर्वे हुआ उसकी रिपोर्ट कहती है कि ये जो खंभों पर खड़ा हुआ बड़ा हॉल है ये एक पुराने मंदिर के अवशेषों से बना हुआ दिखता है. खंभों पर हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियां नज़र आती हैं, मां सरस्वती की स्तुति में संस्कृत में शिलालेख दिखते हैं, परमार राजवंश के समय के पत्थर मिलने की बात है और हवन कुंड दिखता है. साथ ही कमाल मौला की दरगाह भी दिखती है और फ़ारसी में लिखी हुई भी पंक्तियां नज़र आती हैं. 1902 में धार रियासत जो थी उसमें शिक्षा के अधीक्षक होते थे के. के. लेले. कहते हैं उस टाइम वहां अग्रेज़ वायसरॉय लॉर्ड कर्ज़न को धार आना था तो उनकी यात्रा के लिए इस जगह पर एक दस्तावेज़ तैयार किया था के. के. लेले साहब ने. और भोजशाला नाम इस दस्तावेज़ में पहली बार मिलता है। 

भोजशाला, धार और अंग्रेजों की एंट्री
उससे पहले जो अंग्रेज़ आए 1822 में, जॉन मैल्कम 1888 में विलियम किनकेड, उन्होंने इस जगह के बारे में लिखते हुए भोजशाला नाम का इस्तेमाल नहीं किया था. लेकिन पास ही में राजा भोज के महल से कई चीज़ें विलियम किनकेड को मिल चुकी थीं. राजा भोज परमार वंश के बहुत बड़े और विद्वान राजा माने जाते थे. वो ज्ञान, कला, विज्ञान और साहित्य के बहुत बड़े प्रेमी थे. और सबसी बड़ी बात तो ये कि उन्होंने खुद 84 किताबें लिखी थीं और 100 से ज्यादा मंदिर बनवाए. राजा भोज मां सरस्वती, जिन्हें मां वाग्देवी भी कहते हैं, उनके के बहुत बड़े भक्त माने जाते थे. ये तो आप जानते ही हैं कि सरस्वती ज्ञान, विद्या, वाणी और कला की देवी हैं. इसलिए उन्होंने अपनी राजधानी धार में एक बड़ा शिक्षा केंद्र बनवाया. इसी को के. के. लेले ने अपने दस्तावेज़ में भोजशाला नाम दिया था. कहते हैं कि ये 1035 में वसंत पंचमी के दिन बनकर तैयार हुआ. भोजशाला सिर्फ एक शाला नहीं थी, बल्कि कहते हैं कि ये सरस्वती सदन भी था, यानी मां सरस्वती का मंदिर भी था. और राजा भोज ने मां वाग्देवी की एक सुंदर मूर्ति स्थापित की थी.  मूर्ति को भोजशाला के मुख्य स्थान पर रखा गया ताकि छात्र-छात्राएं पहले मां सरस्वती की पूजा करें, फिर पढ़ाई करें। 

भोजशाला मतलब ‘विद्या की काशी’
माना जाता है इस भोजशाला में दूर-दूर से छात्र आते थे. यहां संस्कृत व्याकरण, विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन और कला पढ़ाई जाती थी. और भोजशाला धार शहर का गौरव था. तो अब सवाल ये था कि वो मूर्ति भी तोड़ दी गई थी? जब आक्रमणकारियों ने धार पर हमला किया था? या मूर्ति ढहा दी गई? आज़ादी के बाद प्रसिद्ध पुरातत्वविद डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने खोज शुरू की तो उनको पता चला कि 1875 में ब्रिटिश अधिकारी मेजर किंकेड को धार के पुराने महल के खंडहर से बहुत कुछ मिला था. और वो सब उन्होंने इंग्लैंड भिजवा दिया था. पता चला कि मेजर किंकेड को जो मिला था वो लंदन के ब्रिटिश म्यूज़ियम में रखा हुआ है. डॉक्टर वाकणकर ने राजा भोज की ख़ुद की लिखी किताबों का अध्ययन किया हुआ था. उनमें एक किताब ख़ास थी। 

लंदन में है मां सरस्वती की मूर्ति?
किताब का नाम था ‘समरांगण सूत्रधार’. राजा भोज ने ये किताब लिखी थी मंदिर बनाने की विद्या पर. डॉक्टर वाकणकर 1961 में लंदन गए. ब्रिटिश म्यूज़ियम पहुंचे. वहां एक हॉल में वो चीज़ें थीं जो धार के महल से मिली थीं विलियम किंकेड को. एक मूर्ति थी. वाग्देवी की मूर्ति. डॉक्टर वाकणकर ने उसका अध्ययन किया. उसको नापा. फोटो खींचे. फिर शिलालेख पढ़े. और फिर राजा भोज की लिखी मंदिर के वास्तुशास्त्र की किताब से मैच किया. मूर्ति की मुद्रा, आभूषण, 11वीं सदी की कलाकारी.  सब मैच कर रहा था. और उन्होंने सब प्रमाणों के साथ साबित कर दिया कि ये वही मूर्ति है जो ख़ुद राजा भोज ने स्थापित की थी भोजशाला में. ये भोजशाला से ना मिलकर धार के महल के खंडहर से कैसे मिली इसकी भी कई थ्योरियां हैं. लेकिन मूर्ति पर शिलालेख में राजा भोज का नाम और वाग्देवी का ज़िक्र है. और ये 11वीं सदी की शैली में बनी है, जो ठीक राजा भोज के काल से मेल खाती है। 

मां सरस्वती की मूर्ति की मूर्ति पर विवाद नहीं
तो भोजशाला का केस भले ही अब सुप्रीम कोर्ट में चला जाए. लेकिन जिसपर विवाद नहीं है वो है मां सरस्वती की मूर्ति. कोर्ट ने भी कहा है कि भारत सरकार को वो मूर्ति लाने की कोशिश तेज़ करनी चाहिए और ब्रिटिश सरकार से बात करनी चाहिए उसके लिए. कई बार सरकार ने कोशिश तो की है लेकिन उस कोशिश का कुछ हुआ नहीं है अभी तक. क्योंकि भोजशाला मंदिर है ये तो फ़ैसला अदालत ने सुना दिया, लेकिन मंदिर की देवी को जब मंदिर में स्थान मिलेगा वही तो असली ऐसतिहासिक दिन होगा. कोहिनूर को अंग्रेज़ों से वापस लेना ये तो सब बोलते रहते हैं, लेकिन वो तो एक रत्न ही है. ये तो देवी हैं. वो धरोहर है जो निस्संदेह हमारी है, भोजशाला की है, धार की है, देश की है. सौ बात की एक बात। 

 

 

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