महिलाओं ने कब शुरू की शेविंग? प्राचीन मिस्र से दूसरे विश्व युद्ध तक बदलता रहा ट्रेंड, जानिए दिलचस्प इतिहास

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नई दिल्ली
 शेविंग और वैक्सिंग महिलाओं की ग्रूमिंग का अहम हिस्सा माना जाता है। अंडरआर्म्स से लेकर अपर लिप्स तक, शरीर के बालों को हटाना महिलाओं के ब्यूटी रूटीन का हिस्सा बन चुका है। एक टीनएजर से लेकर एक वयस्क महिला तक, हर किसी को अपने हाथ-पैरों और चेहरे को बिल्कुल चिकने चाहिए, लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं रहा है।  

महिलाओं में बॉडी शेविंग और वैक्सिंग का चलन काफी बाद में शुरू हुआ और इसके पीछे एक बड़े मार्केटिंग कैंपेन का हाथ था। आइए जानें महिलाओं के लिए शेविंग कैसे उनके ग्रूमिंग का जरूरी हिस्सा बन गया।  

सोशल स्टेटस का प्रतीक
महिलाओं शरीर के बाल हटाने का इतिहास प्राचीन मिस्त्र और रोमन साम्राज्य के समय से जुड़ा है। मिस्त्र में उच्च वर्ग की महिलाएं अफने शरीर से बाल हटाया करती थीं। इसके लिए सीपियों से बने ट्वीजर्स, मधुमक्खी की वैक्स और चीनी के लेप का इस्तेमाल किया जाता था। 

रोमन साम्राज्य और ग्रीस की महिलाएं पत्थर और एक खास तरह की क्रीम का इस्तेमाल शरीर के बाल हटाने के लिए किया करती थीं। हालांकि, यो सिर्फ उच्च वर्ग की महिलाएं ही किया करती थीं।   
 
समय के साथ आया बदलाव
मध्यकाल आते-आते यूरोप में शरीर के बाल हटाने का चलन कम हो गया। ऐसा उस समय के धार्मिक विचारों के कारण था। हालांकि, इस दौर में भी महिलाएं आईब्रो और हेयर लाइन के बाल पीछे तक हटाया करती थीं, ताकि चेहरे का आकार ज्यादा गोल लगे। 

20वीं सदी में शुरू हुआ विज्ञापनों का खेल
19वीं सदी के अंत तक पश्चिमी देशों में आम महिलाएं अपने शरीर के बाल नहीं हटाती थीं। उस समय के कपड़े पूरे शरीर को ढककर रखते थे, जिसके कारण शरीर के बाल हटाने की जरूरत पूरी तरह से खत्म हो गई, लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में यह बदलने लगा। इस बदलाव की वजह थी फैशन में बदलाव आना और महिलाओं की खूबसूरत दिखने की चाह का फायदा उठाकर कंपनियें का मुनाफा कमाना। 

1915 का ऐतिहासिक मार्केटिंग कैंपेन
1915 से पहले तक अमेरिका और यूरोप में महिलाएं अपने अंडरआर्म्स शेव नहीं किया करती थीं, लेकिन फिर फैशन में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। मार्केट में स्लीवलेस ड्रेसेज का चलन बढ़ा और इसी का फायदा रेजर बनाने वाली कंपनियों ने उठाया।

साल 1915 में एक ऐसा मार्केटिंग कैंपेन चलाया गया, जिसे द फ्रस्ट ग्रेट एंटी-हेयर मूवमेंट कहा गया। इस कैंपेन में महिलाओं को ज्यादा मॉडर्न और फैंशनेबल दिखने के लिए अंडरआर्म्स के बाल हटाने के लिए प्रेरित किया गया और इसके लिए खास रेजर भी बाजार में लॉन्च किया गया। ये कैंपेन काफी सफल हुआ और महिलाओं ने स्लीवलेस ड्रेसेज पहनने के लिए अंडरआर्म्स शेव करना शुरू कर दिया। 

विश्व युद्ध और पैर शेव करने की मजबूरी
अब अंडरआर्म्स शेविंग आम बात हो चुकी थी, लेकिन अभी भी महिलाएं अपने पैर शेव नहीं कर रही थीं, क्योंकि वे ड्रेसेज के नीचे स्टॉकिंग्स पहना करती थीं, जो नायलॉन की बनी होती थीं। हालांकि, विश्व युद्ध ने इसे भी बदल दिया। युद्ध के समय सेना के लिए पैराशूट बनाने के लिए नायलॉन का ज्यादा इस्तेमाल होने लगा। इससे बाजार में नायलॉन स्टॉकिंग्स की कमी हुई और महिलाओं ने बिना स्टॉकिंग्स के स्कर्ट पहनना शुरू किया। 

इसके लिए उन्होंने अपने पैरों के बाल भी शेव करना शुरू कर दिया। इसके बाद घुटनों से ऊपर की ड्रेसेज और बिकिनी बाजार में आई। फैशन में आए इन बदलावों ने महिलाओं के बीच शेविंग पर और भी जोर दिया। 

अब आप जान ही गए होंगे कि जिसे आज हम जिसे महिलाओं की खूबसूरती का पैमाना और पर्सनल चॉइस का नाम देते हैं, वो असल में फैशन और मार्केटिंग इंडस्ट्री की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थी।    

 

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