ज्ञानवापी मामले में सुप्रीम कोर्ट का फॉर्मूला चर्चा में, न हिंदू पक्ष संतुष्ट, न मुस्लिम पक्ष; आगे क्या होगा?

Editor
5 Min Read
ज्ञानवापी मामले में सुप्रीम कोर्ट का फॉर्मूला चर्चा में, न हिंदू पक्ष संतुष्ट, न मुस्लिम पक्ष; आगे क्या होगा?
WhatsApp Share on WhatsApp
add_action('wp_footer', 'jazzbaat_new_version_modal'); function jazzbaat_new_version_modal() { ?>
SW24news • Beta

बनारस 

ज्ञानवापी मस्जिद, श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह और संभल मस्जिद के मामले में हिंदू और मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। शीर्ष न्यायालय ने तीनों मामलों में मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया था। दोनों पक्षों की ओर से कहा गया है कि इनपर अदालत में ही कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी। दरअसल, शीर्ष न्यायालय ने इन मामलों में मध्यस्थता के लिए पार्टियों की सहमति मांगी थी।

विवाद और दावे
वाराणसी में एक-दूसरे से सटे दो धार्मिक स्थलों को लेकर जारी विवाद, अयोध्या और मथुरा के साथ-साथ तीन सबसे चर्चित मामलों में से एक है। हिंदू पक्ष का दावा है कि मूल काशी विश्वनाथ मंदिर को औरंगजेब के शासनकाल के दौरान ध्वस्त कर दिया गया था और उसके ऊपर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया गया था। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह विवाद उपासना स्थल अधिनियम के तहत वर्जित है, क्योंकि वे सदियों से लगातार मस्जिद में नमाज अदा करते आ रहे हैं।

वर्ष 2021 में पांच महिलाओं ने वाराणसी की एक अदालत में प्रार्थना करने की अनुमति मांगने के लिए मुकदमा दायर किया। बाद में किए गए सर्वेक्षण में वज़ूखाने के अंदर एक 'शिवलिंग' मिला, जिसे मुस्लिम पक्ष एक फव्वारे की व्यवस्था का हिस्सा बताता है।

वर्ष 2022 में शीर्ष अदालत ने उस स्थान को संरक्षित किया जहां 'शिवलिंग' मिला था और साथ ही यह निर्देश भी दिया कि मुस्लिम उपासकों को मस्जिद तक पहुंचने में कोई बाधा नहीं डाली जानी चाहिए।

इसने 2024 में वाराणसी अदालत के उस आदेश पर रोक लगाने से भी इनकार कर दिया था जिसमें मस्जिद के अंदर 'व्यास जी का तहखाना' में एक हिंदू पुजारी को दैनिक रूप से पूजा-अर्चना करने की अनुमति दी गई थी।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह
यह मामला मथुरा में स्थित 13.37 एकड़ के परिसर से संबंधित है, जिसमें भगवान कृष्ण का जन्मस्थान माना जाने वाला कृष्ण जन्मभूमि मंदिर परिसर और शाही ईदगाह मस्जिद शामिल हैं।

जहां एक ओर हिंदू समुदाय का दावा है कि शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में 17वीं शताब्दी के दौरान देवता के जन्मस्थान पर स्थित एक पुराने मंदिर के ऊपर किया गया था, वहीं मुस्लिम पक्ष ने उपासना स्थल अधिनियम, 1991 का हवाला दिया है।

देवता के 'अगले मित्र' कहे जाने वाले हिंदू उपासकों और संगठनों द्वारा जमीन पर कब्जा पाने और मंदिर को बहाल करने के लिए दायर किए गए 18 मुकदमे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित हैं।

उच्च न्यायालय ने 1 अगस्त, 2024 को मुस्लिम पक्ष की उन अर्जियों को खारिज कर दिया, जिनमें हिंदू उपासकों के मुकदमों की वैधता को चुनौती दी गई थी। इसी आदेश में अदालत ने यह भी कहा कि ये मुकदमे परिसीमा अधिनियम, वक्फ अधिनियम और उपासना स्थल अधिनियम, 1991 द्वारा वर्जित नहीं हैं।

शाही जामा मस्जिद, संभल, उत्तर प्रदेश
वर्ष 2024 में संभल जिला एक विवाद का केंद्र बन गया जब एक स्थानीय अदालत ने एक हिंदू श्रद्धालु द्वारा दायर मुकदमे पर शाही जामा मस्जिद का सर्वेक्षण करने का आदेश दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि यह एक प्राचीन हिंदू मंदिर के स्थल पर बनाई गई थी।

हिंदू पक्ष का दावा है कि शाही जामा मस्जिद का निर्माण मुगल सम्राट बाबर के शासनकाल के दौरान 1526 में भगवान विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि को समर्पित हरिहर मंदिर को नष्ट करने के बाद किया गया था।

सर्वेक्षण के दूसरे दौर के दौरान, प्रदर्शनकारी स्थानीय लोगों की सुरक्षाकर्मियों के साथ झड़प हुई, जिसके परिणामस्वरूप चार लोगों की मौत हो गई और दर्जनों लोग घायल हो गए।

मुस्लिम पक्ष ने इस आधार पर सर्वेक्षण का विरोध किया कि इसे मस्जिद समिति की उचित सुनवाई किए बिना जल्दबाजी में कराया गया था। उसने उपासना स्थल अधिनियम के उल्लंघन का भी आरोप लगाया।

बाद में उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सर्वेक्षण कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार किए जाने को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया।

Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *