35 साल पुराने केस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: इलाहाबाद हाईकोर्ट से मांगा मुकदमों और कैदियों का पूरा ब्योरा

Editor
6 Min Read
35 साल पुराने केस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: इलाहाबाद हाईकोर्ट से मांगा मुकदमों और कैदियों का पूरा ब्योरा
WhatsApp Share on WhatsApp
add_action('wp_footer', 'jazzbaat_new_version_modal'); function jazzbaat_new_version_modal() { ?>
SW24news • Beta

प्रयागराज 

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में 35 साल से लंबित एक आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है। यह मामला कुंभ मेला ड्यूटी के दौरान पुलिस मेस में खाने को लेकर हुए विवाद से जुड़ा था। पुलिसकर्मी को राहत देने के साथ ही, शीर्ष अदालत ने यूपी में पेंडिंग मुकदमों, जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों (अंडरट्रायल) और जमानत मिलने में हो रही देरी के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से राज्य की अदालतों में लंबित मामलों का पूरा विस्तृत डेटा तलब किया है।

'35 साल का समय बहुत लंबा, त्वरित न्याय मौलिक अधिकार'
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने 29 अप्रैल के अपने फैसले में यूपी पुलिस के कांस्टेबल कैलाश चंद्र कापड़ी (आरोपी) की अपील को स्वीकार कर लिया। कापड़ी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें 1991 से उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मारपीट और आपराधिक धमकी जैसे आरोपों के लिए 35 साल तक मुकदमा चलना बिना किसी औचित्य के है। अदालत ने कहा, "मारपीट और धमकी के मुकदमे के लिए 35 साल बहुत लंबा समय है। त्वरित न्याय संविधान के अनुच्छेद 21 का अनिवार्य हिस्सा है। बेंच ने कहा कि इतनी लंबी कार्यवाही आरोपी के त्वरित सुनवाई और निष्पक्ष प्रक्रिया के अधिकार का उल्लंघन है।

खाने को लेकर हुआ था विवाद, 5 पुलिसकर्मियों पर दर्ज हुई थी FIR
यह मामला 1989 का है। कुंभ मेला ड्यूटी पर तैनात पांच पुलिस कांस्टेबलों पर आरोप था कि उन्होंने इलाहाबाद के जीआरपी रामबाग पुलिस स्टेशन की मेस (भोजनालय) में खाने के विवाद के बाद एक अन्य कांस्टेबल के साथ मारपीट की थी। एफआईआर में कापड़ी समेत पांच कांस्टेबलों को आरोपी बनाया गया था। इन पर दंगा करने (धारा 147), जानबूझकर चोट पहुंचाने (धारा 323), और जानबूझकर अपमान करने (धारा 504) के साथ-साथ रेलवे अधिनियम की धारा 120 के तहत मामला दर्ज किया गया था। चार्जशीट दाखिल होने के बाद मामला इलाहाबाद के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (रेलवे) की अदालत में पहुंचा था।

सुनवाई के दौरान दो सह-आरोपियों की मौत हो गई, जबकि दो अन्य को 2023 में इसलिए बरी कर दिया गया क्योंकि अभियोजन पक्ष किसी भी गवाह को पेश करने में विफल रहा। इसके बाद कापड़ी ने कार्यवाही रद्द करने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन राहत न मिलने पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट से मांगा पेंडिंग केसों का विस्तृत डेटा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल एक आरोपी को राहत देने से इस फैसले का व्यापक उद्देश्य पूरा नहीं होगा। अदालती सिस्टम की बड़ी खामियों को संज्ञान में लेते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को 13 जुलाई तक एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने इस मामले को 'पार्ट-हर्ड' (आंशिक रूप से सुना गया) माना है। सुप्रीम कोर्ट ने हलफनामे में निम्नलिखित जानकारियां मांगी हैं:

लंबित मुकदमे और कैदी: ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC), चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (CJM) और सेशन कोर्ट में पेंडिंग कुल केस, ये केस कितने पुराने हैं और विचाराधीन कैदियों की जेल में बिताई गई अवधि क्या है।

अदालती बाधाएं: मुकदमों के मौजूदा स्टेटस और कोर्ट की कार्यवाही आगे बढ़ाने में आ रही अड़चनों की जानकारी।

जजों की स्थिति: राज्य में JMFC, CJM और सेशन जजों की स्वीकृत संख्या, मौजूदा वर्किंग स्ट्रेंथ और खाली पदों की रिपोर्ट।

भर्ती प्रस्ताव: जजों के रिक्त पदों को भरने के लिए हाई कोर्ट द्वारा राज्य सरकार को भेजे गए पेंडिंग प्रस्तावों की स्थिति।

जमानत अर्जियों पर भी मांगी गई सख्त रिपोर्ट

शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के समक्ष लंबित जमानत अर्जियों के संबंध में भी विस्तृत जानकारी मांगी है:

    30 अप्रैल 2026 तक पेंडिंग जमानत अर्जियों का साल-वार आंकड़ा।

    क्या पेंडिंग जमानत अर्जियों को विचाराधीन कैदियों द्वारा जेल में बिताई गई अवधि के आधार पर बांटा जा सकता है?

    ऐसे मामलों की संख्या जहां विचाराधीन कैदियों ने 10 साल से अधिक, 8-10 साल, 6-8 साल, 4-6 साल, 2-4 साल, 1-2 साल और 0-1 साल का समय जेल में बिताया है।

    क्या पुराने जमानत मामलों और लंबे समय से जेल में बंद कैदियों के मामलों को प्राथमिकता देने का कोई सिस्टम मौजूद है?

    ऐसे कैदियों की संख्या जो 5 साल से ज्यादा समय से हिरासत में हैं, लेकिन उनकी जमानत अर्जी न तो दाखिल हुई है और न ही उस पर फैसला हुआ है।

TAGGED:
Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *