भोजशाला में मिले हिंदू पक्ष के मजबूत सबूत! मूर्तियां, श्लोक और हवनकुंड ने बदली तस्वीर

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धार 

मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला विवाद पर हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI की 98 दिन तक चली वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट को सही मानते हुए भोजशाला परिसर को हिंदू मंदिर स्वरूप वाला स्थल माना है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐतिहासिक साक्ष्य, साहित्य, संरचनाएं और ASI की रिपोर्ट यह स्थापित करती हैं कि यह स्थान राजा भोज से जुड़ा संस्कृत अध्ययन और देवी वाग्देवी सरस्वती की आराधना का प्रमुख केंद्र था। 

इस मामले की सुनवाई जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस अशोक अवस्थी की खंडपीठ ने की. यह मामला इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि दोनों जजों ने खुद भोजशाला परिसर का दौरा कर जमीनी स्थिति का निरीक्षण किया. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह निर्णय सिर्फ दस्तावेजों और रिपोर्टों के आधार पर नहीं बल्कि स्थल के प्रत्यक्ष निरीक्षण के बाद दिया गया है। 

पूजा पर रोक वाला पुराना आदेश रद्द

कोर्ट ने कहा कि अगर कमाल मौला मस्जिद से जुड़े मुस्लिम पक्षकार चाहें तो वे मस्जिद के लिए धार शहर या उसके आसपास वैकल्पिक जमीन आवंटित करने की मांग सरकार से कर सकते हैं. अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी मांग आने पर सरकार उस पर विचार करेगी. हिंदू पक्ष की ओर से अदालत में एक और महत्वपूर्ण मांग रखी गई थी. इसमें राजा भोज की आराध्या मानी जाने वाली वाग्देवी सरस्वती की प्राचीन प्रतिमा को लंदन स्थित ब्रिटिश म्यूजियम से वापस भारत लाने के लिए आदेश देने की मांग की गई थी। 

कोर्ट ने इस पर कहा कि याचिकाकर्ता सरकार को ज्ञापन दे सकते हैं और सरकार इस विषय पर विचार कर सकती है. भोजशाला और कमाल मौला मस्जिद का विवादित क्षेत्र 18 मार्च 1904 से संरक्षित स्मारक के रूप में दर्ज है. यह परिसर 1958 के प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल अधिनियम के तहत भी संरक्षित है. लंबे समय से यह विवाद बना हुआ था कि इस स्थल का धार्मिक स्वरूप क्या है. हिंदू पक्ष इसे देवी वाग्देवी सरस्वती का मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र बताता रहा है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद मानता रहा है। 

ASI रिपोर्ट में मिले मंदिर के कई प्रमाण
अदालत के आदेश पर ASI ने यहां 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था. इस सर्वे के दौरान परिसर की दीवारों और खंभों पर कई ऐसे चिन्ह और आकृतियां मिलीं जिन्हें हिंदू मंदिर स्थापत्य से जुड़ा माना गया. रिपोर्ट में कमल, केले के स्तंभ, घंटियां, पल्लव, श्रीफल युक्त कलश और देवी-देवताओं की उकेरी गई मूर्तियों का उल्लेख किया गया. इसके अलावा संस्कृत श्लोक, शिलालेख और धार्मिक प्रतीकों के भी प्रमाण मिले. ASI ने इन सभी अवशेषों की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराई थी। 

सर्वे में जमीन के नीचे भी मंदिर जैसे ढांचे के संकेत मिलने की बात कही गई. परिसर में एक हवनकुंड मिलने का भी जिक्र रिपोर्ट में किया गया है. अदालत ने कहा कि इन सभी साक्ष्यों से यह साबित होता है कि यह स्थल हिंदू धार्मिक और शैक्षणिक परंपरा से जुड़ा रहा है. हाईकोर्ट ने ASI के वर्ष 2003 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें हिंदुओं के पूजा अधिकारों को सीमित किया गया था जबकि मुस्लिम समुदाय को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी. अदालत ने कहा कि ऐसा आदेश समानता और धार्मिक अधिकारों के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। 

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि सरकार की जिम्मेदारी है कि तीर्थयात्रियों और श्रद्धालुओं के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं. साथ ही परिसर की पवित्रता, धार्मिक स्वरूप और कानून व्यवस्था बनाए रखना भी सरकार का संवैधानिक कर्तव्य है. अदालत ने अपने निष्कर्ष में कहा कि भोजशाला में हिंदू पूजा की परंपरा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। 

हिंदुओं के पूजा अधिकारों पर लगी रोक हटाई गई
इसके अलावा कोर्ट ने माना कि ऐतिहासिक साहित्य और उपलब्ध साक्ष्य यह स्थापित करते हैं कि यह स्थल परमार राजवंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था. इसी के साथ हाईकोर्ट ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की रिट याचिका संख्या 10497/2022 और कुलदीप तिवारी की याचिका संख्या 10484/2022 का निपटारा करते हुए विस्तृत निर्देश जारी किए. फैसले के बाद भोजशाला विवाद को लेकर देशभर में चर्चा तेज हो गई है और अब आगे सरकार के कदमों पर सभी की नजर बनी हुई है। 

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