Punjab News: बेअदबी मामलों की जांच में बदलेगी पुलिस की भाषा, PBI ने जारी की 22 पवित्र शब्दों की सूची

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चंडीगढ़.

पंजाब में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी से जुड़े बेअदबी मामलों की जांच अब केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जांच की भाषा और दस्तावेजों में भी धार्मिक मर्यादा और श्रद्धा स्पष्ट रूप से दिखाई देगी।

पंजाब ब्यूरो आफ इन्वेस्टिगेशन (पीबीआइ) ने बेअदबी से जुड़े मामलों की जांच के लिए 22 सम्मानजनक धार्मिक शब्दों की सूची जारी करते हुए राज्य के सभी पुलिस कमिश्नरों, रेंज अधिकारियों और जिला पुलिस प्रमुखों को विस्तृत दिशा-निर्देश भेजे हैं। पीबीआइ की ओर से जारी इस सर्कुलर का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बेअदबी जैसे अत्यंत संवेदनशील मामलों में पुलिस की ओर से इस्तेमाल की जाने वाली भाषा किसी भी रूप में धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुंचाए। अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि केस डायरी, एफआइआर, चार्जशीट और जांच से जुड़े सभी आधिकारिक दस्तावेजों में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी तथा उनसे संबंधित वस्तुओं और प्रक्रियाओं का उल्लेख केवल निर्धारित सम्मानजनक शब्दों से ही किया जाए।

पंजाबी में उच्चारित शब्द ही लिखे जाएं
पीबीआइ निदेशक एलके यादव की ओर से जारी सर्कुलर में कहा है कि जांच में “क्लीनिकल और आब्जेक्टिव लैंग्वेज” का प्रयोग किया जाए, ताकि तथ्यों को निष्पक्ष तरीके से दर्ज किया जा सके, लेकिन साथ ही धार्मिक गरिमा भी अक्षुण्ण बनी रहे। सर्कुलर में यह भी कहा गया है कि जांच के दौरान ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए जिससे पवित्र सामग्री का दोबारा अनादर होने का जोखिम पैदा हो।
पीबीआइ की ओर से जारी सूची में जागत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, पावन स्वरूप, पावन अंग, रुमाला साहिब, चौर साहिब, पालकी साहिब, पीढ़ा साहिब, चंदोआ साहिब, सैंची साहिब, गुटका साहिब, नितनेम, प्रकाश स्थान, सुखासन, थड़ा साहिब, ग्रंथी सिंह, सेवक/सेवादार, बिरध अवस्था, चाले पाना/पहुंच कर्मा और आनंद कारज जैसे शब्द शामिल हैं। इन शब्दों को अंग्रेजी दस्तावेजों में भी ठीक उसी तरह लिखा जाएगा जैसे पंजाबी में उच्चारित किए जाते हैं, ताकि मूल धार्मिक संदर्भ और सम्मान बना रहे।

मर्यादा का पूर्ण पालन करना जरूरी
उदाहरण के तौर पर रुमाला साहिब को श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी पर आदरपूर्वक ओढ़ाए जाने वाले सजावटी वस्त्र के रूप में परिभाषित किया गया है। चौर साहिब को श्रद्धा स्वरूप किया जाने वाला चंवर बताया गया है, जबकि पालकी साहिब वह पवित्र स्थान है जहां श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का पावन स्वरूप स्थापित किया जाता है। इसी तरह बिरध अवस्था का उपयोग उस स्थिति के लिए होगा जब पावन स्वरूप समय और उपयोग के कारण पुराना हो जाए। सर्कुलर का एक अहम हिस्सा यह भी है कि बेअदबी मामलों की जांच के दौरान पुलिस को धार्मिक संस्थाओं के साथ समन्वय बनाकर काम करना होगा। यदि घटनास्थल से श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी या उसके किसी अंग की बरामदगी होती है तो पुलिस संबंधित धार्मिक अधिकारियों, विशेषकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर कार्रवाई करेगी। सर्कुलर में साफ कहा गया है कि एसजीपीसी द्वारा निर्धारित धार्मिक प्रोटोकाल और सिख रहत मर्यादा का पूरी तरह पालन किया जाना चाहिए। घटनास्थल पर मौजूद पवित्र सामग्री को अत्यंत सम्मान और गरिमा के साथ संभालना अनिवार्य होगा।
पहले भी SOP हो चुकी है जारी
गौरतलब है कि यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब पंजाब सरकार पहले ही बेअदबी मामलों को लेकर सख्त कानूनी ढांचा तैयार कर चुकी है। अप्रैल में पीबीआइ ने बेअदबी मामलों की जांच के लिए एक विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) जारी किया था। इसमें हाई रेजोल्यूशन फोटोग्राफी, डिजिटल साक्ष्यों के संरक्षण, इलेक्ट्रॉनिक फुटप्रिंट की जांच और साजिश की कड़ियों को जोड़ने जैसे आधुनिक जांच मानक शामिल किए गए। साथ ही जांच एजेंसियों को 60 से 90 दिनों के भीतर चालान अदालत में पेश करने की समयसीमा भी दी गई।

20 अप्रैल को लागू किया गया था एक्ट
इसके अलावा पंजाब सरकार ने 20 अप्रैल को जागत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) एक्ट-2025 को लागू किया था। इस कानून के तहत श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी से जुड़े अपराधों के लिए न्यूनतम सात साल से लेकर 20 साल तक की सजा का प्रावधान है। साथ ही दोषी पर दो लाख रुपये से 10 लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है। यदि जांच में यह साबित होता है कि बेअदबी सुनियोजित साजिश का हिस्सा थी या इसके पीछे शांति भंग करने अथवा सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की मंशा थी, तो सजा 10 साल से लेकर उम्रकैद तक हो सकती है। ऐसे मामलों में पांच लाख रुपये से 25 लाख रुपये तक जुर्माने का भी प्रावधान रखा गया है।

हालांकि इस कानून की कुछ धाराओं को लेकर धार्मिक संस्थाओं ने आपत्ति भी जताई है। एसजीपीसी और अकाल तख्त ने विशेष रूप से “कस्टोडियन” शब्द के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इस शब्द की व्यापक व्याख्या से ग्रंथियों, प्रबंधकों, गुरुद्वारा कमेटियों और सेवादारों पर अनजाने में भी आपराधिक जिम्मेदारी आ सकती है, जबकि कई बार मर्यादा का उल्लंघन जानबूझकर नहीं होता। रिकॉर्ड मेंटेनेंस और पावन स्वरूपों की ट्रैकिंग संबंधी कुछ प्रावधानों पर भी सिख संस्थाओं ने चिंता जताई है।

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