घरों में रखी पाण्डुलिपियों का संरक्षण जरूरी : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

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भोपाल 

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि मठ मंदिरों के साथ-साथ कई घरों में भी प्राचीन पाण्डुलिपियां सुरक्षित हैं। हमारी सांस्कृतिक स्मृतियां, ज्ञान, परम्पराएं, विज्ञान और दर्शन पाण्डुलिपियों के रूप में अभी तक विद्यमान हैं। इन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। इस अमूल्य विरासत के संरक्षण, संवर्धन और दस्तावेजीकरण के लिए ज्ञान भारतम् मिशन की पहल राष्ट्रीय स्तर पर आरंभ की गई है। जिसके अंतर्गत वर्ष 1950 से पहले की पाण्डुलिपियों का डिजिटल रूप से संरक्षण किया जा रहा है। मिशन के अंतर्गत मंदिरों, मठों, आश्रमों, पुस्तकालयों और शैक्षणिक व शोध संस्थाओं के साथ-साथ व्यापारिक प्रतिष्ठानों और घरों में ताड़पत्र, ताम्रपत्र, प्रस्तर, भोजपत्र, पोथियों आदि के रूप में विद्यमान पाण्डुलिपियों का संरक्षण होना है। प्रदेश के एतिहासिक और सांस्कृतिक व धार्मिक रूप से समृद्ध है। यहां के धार्मिक स्थलों के साथ-साथ कई परिवारों तथा व्यापारिक संस्थानों के पास भी पर्याप्त मात्रा में पाण्डुलिपियां विद्यमान हैं। भारत की ज्ञान परम्परा को सुरक्षित रखने के इस राष्ट्रीय अभियान में सक्रिय भागीदारी निभाने के लिए प्रदेशवासियों को प्रोत्साहित करना जरूरी है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कलेक्टर्स वीसी में ज्ञान भारतम् मिशन के संबंध में यह निर्देश दिए। मुख्यमंत्री निवास स्थित समत्व भवन में हुई बैठक में मुख्य सचिव  अनुराग जैन, अपर मुख्य सचिव  नीरज मंडलोई और अपर मुख्य सचिव संस्कृति  शिव शेखर शुक्ला उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव की अध्यक्षता में हुई बैठक में बताया गया कि प्रदेश के जिलों में उपलब्ध पाण्डुलिपियों की अनुमानित संख्या 10 लाख 24 हजार 571 हैं। पाण्डुलिपियों के संरक्षण के लिए जिला स्तर पर कलेक्टर की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है। समिति द्वारा ज्ञान भारतम् मोबाइल एप के माध्यम से पाण्डुलिपियों का सर्वेक्षण और उनकी अपलोडिंग की जा रही है। इस मिशन के लिए भारत सरकार और प्रदेश के पुरातत्व विभाग द्वारा प्रत्येक जिले के लिए एक प्रतिनिधि नियुक्त किया गया है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने पाण्डुलिपि संरक्षण अभियान के लिए पाण्डुलिपि धारकों के साथ संवाद स्थापित कर उन्हें अभियान से जोड़ने के लिए जिला स्तर पर गतिविधियां संचालित करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि इन गतिविधियों में शैक्षणिक संस्थानों और शोधार्थियों के भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

 

 

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