चंडीगढ़ में फाइलों में अटकी NIHEA की 7 करोड़ सालाना की परियोजना, विकास कार्य ठप

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चंडीगढ़.

देश में आधुनिक अस्पतालों की बढ़ती जरूरत के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए विशेषज्ञ इंजीनियर और आर्किटेक्ट तैयार करने की महत्वाकांक्षी योजना दो दशक बाद भी शुरू नहीं हो सकी। वर्ष 2006 में पीजीआइ में नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हेल्थकेयर इंजीनियरिंग एंड आर्किटेक्चर (एनआइएचईए) स्थापित करने की घोषणा हुई थी।

उम्मीद थी कि यहां ऐसे विशेषज्ञ तैयार होंगे, जो भविष्य के अस्पतालों की बेहतर डिजाइन, सुरक्षित निर्माण और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की योजना बना सकेंगे। लेकिन 20 साल बाद भी यह परियोजना केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने वर्ष 2007 में पीजीआइ को संस्थान स्थापित करने के निर्देश दिए थे। इसके साथ हर वर्ष सात करोड़ रुपये तक का बजट उपलब्ध कराने का आश्वासन भी दिया गया था। योजना के तहत हेल्थ फैसिलिटी प्लानिंग एंड डिजाइनिंग तथा हेल्थकेयर इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट जैसे विशेष मास्टर डिग्री कोर्स शुरू किए जाने थे।

इन पाठ्यक्रमों का उद्देश्य ऐसे विशेषज्ञ तैयार करना था, जो अस्पतालों की योजना, निर्माण, तकनीकी प्रबंधन और स्वास्थ्य अवसंरचना को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित कर सकें। हालांकि, परियोजना शुरुआत से ही असमंजस में रही। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014 में स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी ने यह कहते हुए प्रस्ताव रोक दिया कि इसमें पीजीआइ की भूमिका स्पष्ट नहीं है। बाद में गवर्निंग बाडी ने भी माना कि इस तरह का संस्थान स्थापित करना पीजीआइ के मूल दायित्व यानी कोर मैंडेट का हिस्सा नहीं है।

समितियों ने शुरू की मास्टर डिग्री
इसके बाद भी योजना को आगे बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए गए। वर्ष 2016 से 2021 के बीच गठित विभिन्न समितियों ने एमबीए की जगह मास्टर डिग्री पाठ्यक्रम शुरू करने, पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज (पेक), चंडीगढ़ कालेज आफ आर्किटेक्चर और यूआइईटी के सहयोग से पाठ्यक्रम तैयार करने तथा एम्स-जोधपुर और आइआइटी-जोधपुर के संयुक्त माडल को अपनाने जैसी सिफारिशें कीं। लेकिन इन सुझावों के बावजूद परियोजना मंजूरी की दहलीज पार नहीं कर सकी।मार्च 2024 में स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि एनआइएचईए की स्थापना पीजीआइ के कोर मैंडेट में नहीं आती। समिति ने सुझाव दिया कि इस तरह का संस्थान आइआइटी रोपड़ या चंडीगढ़ कालेज आफ आर्किटेक्चर जैसे संस्थानों में स्थापित किया जाना अधिक उपयुक्त होगा।

प्रस्तावों और समितियों के बावजूद परियोजना के बाद भी नहीं निकला हल
ऑडिट रिपोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। दो दशक तक बैठकों, प्रस्तावों और समितियों के बावजूद परियोजना का धरातल पर नहीं उतरना यह दर्शाता है कि स्वास्थ्य क्षेत्र की महत्वपूर्ण योजनाएं कई बार प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझकर रह जाती हैं। यदि यह संस्थान समय पर स्थापित हो जाता, तो देश को अस्पतालों के निर्माण और स्वास्थ्य अवसंरचना के लिए विशेष प्रशिक्षित विशेषज्ञों की एक नई पीढ़ी मिल सकती थी। आज भी महत्वाकांक्षी योजना फाइलों से बाहर आने का इंतजार कर रही है।

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