तबादला नीति पर MP हाई कोर्ट सख्त, कर्मचारियों की आपत्ति पर 30 दिन में फैसला करने के निर्देश

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जबलपुर
 हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने स्थानांतरण मामलों में प्रशासनिक जवाबदेही को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया है कि कर्मचारी के अभ्यावेदन को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने शहडोल निवासी वन कर्मी रामनरेश विश्वकर्मा की याचिका का निराकरण करते हुए राज्य शासन को निर्देश दिए कि लंबित अभ्यावेदन पर 30 दिन के भीतर कानून के अनुरूप कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए तथा उसका निर्णय याचिकाकर्ता को भी अवगत कराया जाए।

कार्यमुक्त न होने पर तबादला आदेश के प्रभाव को स्थगित करने का निर्देश
कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि यदि याचिकाकर्ता को अभी तक कार्यमुक्त नहीं किया गया है तो 16 जून, 2026 के तबादला आदेश का प्रभाव 30 दिन अथवा अभ्यावेदन के निर्णय तक, जो पहले हो, स्थगित रहेगा। हालांकि हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि उसने तबादला आदेश की वैधता अथवा मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शंभू दयाल गुप्ता एवं कपिल गुप्ता ने पक्ष रखा।

प्रशासनिक प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने पर कोर्ट का जोर
उन्होंने अवगत कराया कि यह आदेश साफ करता है कि हाई कोर्ट तबादला आदेशों में सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय प्रशासनिक प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने पर अधिक जोर दे रहा है। अदालत का संदेश स्पष्ट है कि कर्मचारी की आपत्ति पर शासन मौन नहीं रह सकता। हर निर्णय तथ्यों, नियमों और स्पष्ट कारणों के आधार पर होना चाहिए। यह आदेश भविष्य के तबादला विवादों में कर्मचारियों के सुनवाई के अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ माना जाएगा।

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