मौलाना अहमदुल्लाह शाह: 1857 की क्रांति के अनसुने नायक की वीरगाथा

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 अयोध्या

 जिले के फैजाबाद शहर की शहादत की एक कहानी अनसुनी है। यह कहानी एक बागी संत मौलाना अहमदुल्लाह शाह की है जिन्होंने देश की आजादी के लिए बलिदान दे दिया था। उनको 156 साल पहले 5 जून 1858 को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों के इशारे पर धोखा देकर मार दिया गया था।

नगाड़ा साथ लेकर चलते थे मौलाना
मौलाना अहमदुल्लाह शाह की कहानी उस साहस और बलिदान को याद दिलाती है, जिसने भारत की आजादी की 1857 की पहली महान लड़ाई को आकार दिया था। मौलाना अहमदुल्लाह शाह को 'डंका शाह' के नाम से भी जाना जाता था। कहा जाता है कि वे अपने साथ एक नगाड़ा लेकर चलते थे जिससे लोगों को उनके आगमन का संकेत मिलता था।

जीवन आजादी के लिए समर्पित करने की प्रेरणा
बताया जाता है कि अहमदुल्लाह शाह के आध्यात्मिक गुरु एक हिंदू साधु थे, जिन्होंने उन्हें देश को आजादी दिलाने के लिए अपना जीवन समर्पित करने के लिए प्रेरित किया था। उनके बारे में 'अवध एब्स्ट्रैक्ट प्रोसीडिंग्स' सहित अन्य अभिलेखीय रिकॉर्ड में लिखा गया है कि उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व था और वे जोशीले भाषण देते थे। वे अपने भाषणों से लोगों में जोश भर देते थे और उनको अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने को प्रेरित करते थे। वे बिना थके अलग-अलग इलाकों का दौरा करते थे और जहां भी जाते थे, लोगों का समर्थन जुटाने में सफल होते थे।

मौलाना को अंग्रेज मानते थे बड़ा खतरा
अंग्रेज मौलाना अहमदुल्लाह शाह को एक गंभीर खतरा मानते थे। एक समय उनके लखनऊ और आगरा जैसे बड़े शहरों में प्रवेश पर रोक लगाने के आदेश भी जारी किए गए थे। उनकी मौजूदगी से ही अंग्रेजी शासन के अधिकारी सतर्क हो जाते थे। सार्वजनिक सभाओं के दौरान उन्हें सेना के जवान घेर लेते थे।

सन 1857 की क्रांति के दौरान क्रांतिकारियों ने उन्हें अपनी 22वीं इन्फैंट्री रेजिमेंट का नेता नियुक्त किया था। हालांकि कर्नल लेनॉक्स ने उन्हें पकड़कर मौत की सजा सुनाई थी, लेकिन बागियों ने उन्हें छुड़ा लिया था। फैजाबाद उनका मुख्य केंद्र था। वे यहीं से पूरे अवध में अंग्रेजी शासन के विरोध की गतिविधियां चलाते थे।

शाहजहांपुर के राजा ने कराई थी हत्या
जब उनकी सेना लखनऊ की ओर बढ़ी तो वहां उनका फिर से अंग्रेजों से सामना हुआ। उन्हें विशेष रूप से चिनहट की लड़ाई (30 जून 1857) में उनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है। उनके बढ़ते प्रभाव के चलते वे औपनिवेशिक शासन के मुख्य निशाने पर आ गए थे। जब वे औपनिवेशिक शासन के विरोध में संघर्ष के लिए समर्थन मांगने जा रहे थे, तब शाहजहांपुर के राजा जगन्नाथ सिंह ने उनकी हत्या कर दी थी। यह घटना 5 जून 1857 को हुई थी।

 

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