राजस्थान में ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव,थर्मल पावर खरीद को मिली मंजूरी

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राजस्थान में ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव,थर्मल पावर खरीद को मिली मंजूरी
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जयपुर

राजस्थान विद्युत विनियामक आयोग (RERC) के आदेश ने ऊर्जा नीति और भविष्य की बिजली व्यवस्था को लेकर रास्ता साफ कर दिया है. आयोग ने 15 मई को आदेश में दीर्घकालिक थर्मल पावर खरीद की अनुमति दे दी है. इसका मतलब है कि राजस्थान को अब सिर्फ सौलर या पवन ऊर्जा पर निर्भर नहीं रहना होगा. बल्कि स्थायी और लगातार उपलब्ध रहने वाली बिजली के लिए कोयला आधारित उत्पादन भी जारी रहेगा. दरअसल, राजस्थान में बड़े स्तर पर सोलर और विंड प्रोजेक्ट विकसित हो रहे हैं. इन दोनों प्रोजेक्ट में चुनौती भी कम नहीं है. क्योंकि रात में सोलर बिजली उपलब्ध नहीं रहती और कई बार हवा की कमी से विंड एनर्जी उत्पादन भी प्रभावित होता है. ऐसे में ग्रिड को स्थिर बनाए रखने और चौबीस घंटे निर्बाध बिजली आपूर्ति के लिए 'बेसलोड पावर' की जरूरत पड़ती है, जिसे थर्मल पावर प्लांट लगातार उपलब्ध कराते हैं.

इससे क्या होगा फायदा, वो भी जानिए
ऊर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि राजस्थान में आने वाले वर्षों में बिजली की मांग तेजी से बढ़ेगी. औद्योगिक विस्तार, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, डेटा सेंटर, शहरीकरण और कृषि क्षेत्र में बढ़ती बिजली जरूरतों के कारण राज्य को स्थायी बिजली स्रोतों की आवश्यकता होगी. ऐसे में यह आदेश सिर्फ थर्मल पावर खरीद की मंजूरी नहीं, बल्कि राज्य की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. इस ऑर्डर से राजस्थान आने वाले दशक में ऊर्जा सुरक्षा, ग्रिड स्थिरता और चौबीस घंटे बिजली उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए “हाइब्रिड पावर मॉडल” की दिशा में आगे बढ़ सकता है.  

आयोग ने बिजली खरीद के लिए दिए ये विकल्प
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) ने वर्ष 2035-36 तक राजस्थान के लिए 4440 मेगावाट अतिरिक्त कोयला आधारित क्षमता की आवश्यकता बताई थी. इसी के आधार पर RERC ने  कहा कि राज्य की डिस्कॉम्स थर्मल पावर की खरीद कर सकती है. आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार और कंपनियां MoU, ज्वाइंट वेंचर या फिर बोली के जरिए बिजली खरीद कर सकती है.  

बोली का टीबीसीबी ऑप्शन भी खुला
बोली के लिए 'टैरिफ बेस्ड कम्पेटिटिव बिडिंग' (TBCB) मॉडल अपनाया जा सकता है. इसमें अलग-अलग कंपनियां बिजली सप्लाई के लिए बोली लगाएंगी. सबसे कम दर और बेहतर शर्तों पर बिजली उपलब्ध कराने वाली कंपनी को टेंडर दिया जाएगा. इससे बिजली खरीद की लागत कम रखने और पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिलेगी.

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