झारखंड में असंगठित श्रमिकों को बड़ी राहत, करोड़ों की सहायता राशि योजनाओं के तहत वितरित

Editor
9 Min Read
झारखंड में असंगठित श्रमिकों को बड़ी राहत, करोड़ों की सहायता राशि योजनाओं के तहत वितरित
WhatsApp Share on WhatsApp
add_action('wp_footer', 'jazzbaat_new_version_modal'); function jazzbaat_new_version_modal() { ?>
SW24news • Beta

 रांची
 राज्य की सरकार झारखंड असंगठित सामाजिक सुरक्षा योजना का लाभ श्रमिकों को दे रही है। इस वित्तीय वर्ष 2025-26-मार्च तक श्रम, नियोजन, प्रशिक्षण एवं कौशल विभाग ने करोड़ों की सहयोग राशि योजनाओं में प्रदान की।

राज्य के 24 जिलों में इस वित्तीय वर्ष में मृत्यु-दुर्घटना सहायता योजना के तहत कुल 1219 को पांच करोड़ अड़सठ लाख से अधिक राशि प्रदान की गई। इसमें रांची के 81 लोग शामिल हैं और 41 लाख पचास हजार रुपये सहायता राशि दी गई। इसी तरह अंत्येष्टि सहायता योजना के तहत 1234 के आश्रितों को करीब दो करोड़ 46 लाख की राशि प्रदान की गई।

रांची में 81 लोगों के आश्रितों को 1235000 राशि दी गई। मातृत्व प्रसुविधा योजना के तहत 9606 को लाभ मिला और इन्हें करीब 14 करोड़ चालीस लाख नब्बे हजार की राशि दी गई। मुख्यमंत्री असंगठित श्रमिक औजार सहायता योजना के तहत 72229 को 36,11,45000 की राशि प्रदान की गई।

उपचार आजीविका सहायता योजना के तहत 17 को लाभ दिया गया। इन्हें 88215 रुपये प्रदान की गई। अन्य योजनाओं में भी लाभ दिया गया। लाभ के लिए निबंधन अनिवार्य है।
कैसे करें निबंधन

संयुक्त श्रमायुक्त सह अपर निबंधक श्रमिक संघ प्रदीप रोबर्ट लकड़ा ने बताया कि श्रमिक आनलाइन निबंधन करा सकते हैं। इसके लिए आधार कार्ड, बैंक खाता एवं एक पासपोर्ट साइज फोटो चाहिए। नामिनी के आधार के साथ श्रमाधान पोर्टल पर जाकर कर सकते हैं।
यह वीडियो भी देखें

श्रमिकों के लिए सरकार की योजनाएं, लें लाभ
झारखंड सरकार असंगठित सामाजिक सुरक्षा योजना चला रही है। इस योजना के तहत वह ऐसे लोगों को लाभ दे रही है, जो योजना के लिए कानूनन योग्य हों। इसमें 18 से 59 साल तक के कामगारों को शामिल किया गया है।

इसमें 18 से 59 साल तक के स्वनियोजित कर्मकार जिनके पास ढाई एकड़ या उससे कम कृषि योग्य भूमि हो, भवन या अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड में निबंधन नहीं होने वाले नियोजनों में मजदूरी करने वाले कर्मकार जिनकी मजदूरी सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से बहुत अधिक नहीं हो।

ऐसे लोग सरकारी योजनाओं का लाभ ले सकते हैं। ऐसे लोग आनलाइन निबंधन भी करा सकते हैं। सरकार ने भवन निर्माण में लगे श्रमिकों के लिए बोर्ड बनाया है-झारखंड भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार बोर्ड। निर्माण श्रमिकों के लिए योजना है।

इसमें 18 से 60 साल के निबंधित श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए है। इसमें काम के दौरान यदि दुर्घटना में मौत हो जाती है तो उसे पांच लाख का अनुदान दिया जाएगा।

यदि दुर्घटना में पूर्ण अपंग हो जाता है तो तीन लाख का प्रविधान है और सामान्य मौत में एक लाख का। इस योजना के तहत मातृत्व प्रसुविधा योजना भी है। इसमें श्रमिक महिला को प्रथम दो प्रसूतियों के लिए पंद्रह हजार रुपये की सहायता दी जाएगी।
अंत्येष्टि सहायता योजना

इस योजना के तहत निबंधित श्रमिक की मृत्यु होने पर वैध आश्रित को अंतिम संस्कार के लिए मृतक के नामित व्यक्ति-आश्रित को दस हजार रुपये की सहायता दी जाएगी। इसी के साथ चिकित्सा सहायता योजना भी है।

इसमें पांच या उससे अधिक कार्य दिवसों तक अस्पताल में भर्ती रहने पर अकुशल श्रेणी के श्रमिक के लिए विहित दर पर न्यूनतम मजदूरी का भुगतान किया जाएगा। अधिकतम चालीस कार्य दिवस के समतुल्य ही भुगतान होगा।

निश्शक्तता पेंशन योजना
इसमें वैसे निबंधित श्रमिक जो पक्षाघात, कुष्ठ, यक्ष्मा, दुर्घटना के कारण स्थायी रूप से अशक्त हो गए हों, उन्हें एक हजार रुपये प्रति माह एवं दस हजार एकमुश्त अनुग्रह राशि प्रदान की जाएगी।

कब से शुरू हुआ श्रमिक दिवस
श्रम दिवस मनाने की शुरुआत वर्ष 1886 में अमेरिका के शिकागो से हुई थी। उस समय मजदूरों से 12 से 16 घंटे तक काम कराया जाता था। श्रमिकों ने प्रतिदिन आठ घंटे कार्य, उचित वेतन और बेहतर कार्य परिस्थितियों की मांग को लेकर आंदोलन किया।

इस आंदोलन के दौरान कई मजदूरों ने अपने प्राणों की आहुति दी। उनके संघर्ष और बलिदान की स्मृति में वर्ष 1889 में पेरिस में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में एक मई को श्रमिक दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। तभी से यह दिवस विश्वभर में मनाया जाने लगा।

भारत में पहली बार वर्ष 1923 में चेन्नई में मई दिवस मनाया गया। इसके बाद से यह दिवस देशभर में विभिन्न श्रमिक संगठनों, उद्योगों, संस्थानों और सामाजिक संगठनों द्वारा मनाया जाता है। कई राज्यों में एक मई को सार्वजनिक अवकाश भी घोषित किया जाता है।

श्रम संहिता का हो रहा विरोध
इधर वाम दल केंद्र सरकार की श्रम संहिताओं (लेबर कोड्स) को लेकर विरोध कर रहे हैं। संसद में सितंबर 2020 में श्रम संहिताओं के पारित होने के बावजूद अभी तक लागू करने के लिए अधिसूचित नहीं किया गया। चार श्रम संहिता को लेकर मजदूर संगठन आपत्ति कर रहे हैं।

इन्हें कारपोरेट हितों को बढ़ावा देने वाला बता रहे हैं। सीटू के राज्य महासचिव विश्वजीत देब ने कहा कि संहिताओं में परिभाषाओं को षड्यंत्रपूर्वक इस तरह से हेरफेर किया गया है, ताकि योजनाबद्ध तरीके से श्रमिकों के एक बड़े हिस्से को इससे बाहर रखा जा सके।

उदाहरण के लिए 'व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता' (ओएसएचडब्ल्यूसी कोड) में 'वर्कर' और 'एम्पलाई शब्दों का प्रयोग इस प्रकार किया गया है कि अस्पष्टता का लाभ उठाकर गलत व्याख्या करने, भेदभाव करने और बड़ी संख्या में श्रमिकों को इस संहिता के दायरे से बाहर रखने की गुंजाइश बना रहे। परिभाषाओं में 'अप्रेंटिसेज' एवं 'ट्रेनीज शामिल नहीं हैं जो कुछ उद्योगों में कई वर्षों से काम कर रहे हैं।

अनुबंधित कामगारों को 'वर्कर और 'एम्पलाई' के दायरे से बाहर रखा गया है। इंड्यूट्रियल रिलेशन कोड में श्रमिकों और कर्मचारियों के बड़े वर्ग को 'सुपरवाइजर' या 'मैनेजर' कहकर कवरेज से बाहर करने की गुंजाइश है। जिन लोग तथाकथित 'सुपरवाइजरी कैपेसिटी' में कार्यरत हैं और 18000 रुपये से अधिक वेतन प्राप्त करते हैं, उन्हें 'श्रमिक' या 'कर्मचारी' की परिभाषा से बाहर रखा जाएगा।

इसी तरह, प्रतिष्ठान की परिभाषा में दस से कम कर्मचारियों को रोजगार देने वाली इकाइयां शामिल नहीं हैं। 'फैक्ट्री' की परिभाषा में 20 से कम कर्मचारियों को रोजगार देने वाली बिजली चालित फैक्ट्रियां और बिजली से चालित नहीं होने वाली 40 से कम कर्मचारियों को रोजगार देने वाली फैक्ट्रियां शामिल नहीं हैं। पांच हेक्टेयर से कम के बागानों को ओएसएचडब्ल्यूसी कोड लागू होने की दायरे से बाहर रखा गया है।

संहिताओं के क्रियान्वयन के लिए न्यूनतम नियुक्ति की सीमा को इस स्तर तक बढ़ा दिया गया है कि नियोक्ता, संहिता के तहत अपने दायित्वों से आसानी से बच सकते हैं। उदाहरण के लिए, 500 से कम श्रमिकों वाले कारखाने या भवन और अन्य निर्माण कार्यों के लिए किसी सुरक्षा अधिकारी की नियुक्ति की आवश्यकता नहीं है।

यदि श्रमिकों की संख्या 250 से कम है तो किसी कल्याण अधिकारी की नियुक्ति की आवश्यकता नहीं है। यदि श्रमिकों की संख्या 100 से कम है तो किसी कैंटीन की अनिवार्यता नहीं है। इस तरह यह किसी तरह से श्रमिकों के हित में नहीं है।

Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *