हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, सरकार के खिलाफ नारे लगाना देशद्रोह नहीं; पंचकूला हिंसा मामले में राम रहीम समर्थकों को राहत

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चंडीगढ़ 

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि किसी हिंसक प्रदर्शन में शामिल होना, सरकार के खिलाफ नारे लगाना या असहमति व्यक्त करना अपने आप में राजद्रोह (देशद्रोह) का अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंसक विरोध प्रदर्शन दंगा या नहीं था। 

जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने यह टिप्पणी हरियाणा सरकार की उस अपील को खारिज करते हुए की, जिसमें वर्ष 2017 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को सजा सुनाए जाने के बाद कैथल के कलायत में हुई हिंसा के मामले में चार आरोपियों को बरी किए जाने को चुनौती दी गई थी।

राजद्रोह के लिए सिर्फ नारेबाजी काफी नहीं
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार के खिलाफ नारेबाजी करना या उसकी नीतियों का विरोध करना नागरिकों की असहमति व्यक्त करने का एक तरीका हो सकता है। इसे सरकार के प्रति घृणा, तिरस्कार या विद्रोह फैलाने के समान नहीं माना जा सकता।

खंडपीठ ने कहा कि "हिंसक विरोध प्रदर्शन दंगे का रूप ले सकता है, लेकिन केवल हिंसा होने से यह नहीं माना जा सकता कि सरकार के खिलाफ घृणा फैलाने या राजद्रोह का अपराध हुआ है। निर्वाचित लोकतंत्र में सरकार के खिलाफ नारेबाजी मात्र से नागरिकों पर राजद्रोह का आरोप नहीं लगाया जा सकता।"

हताशा-असंतोष को राजद्रोह नहीं माना जा सकता
अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि हताशा, नाराजगी या असंतोष को घृणा या देशद्रोह के बराबर नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में जब आरोप गंभीर हों और सजा भी कठोर हो, तब अदालत का यह दायित्व है कि वह उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी आधार की सख्ती से जांच करे।

हाईकोर्ट ने कहा कि राजद्रोह जैसे गंभीर अपराध में केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि आरोपी की कार्रवाई का उद्देश्य सरकार के खिलाफ घृणा फैलाना, हिंसा के लिए उकसाना या राज्य की सुरक्षा को खतरे में डालना था।

2017 की हिंसा से जुड़ा है मामला
यह मामला अगस्त 2017 का है, जब डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को दोषी ठहराए जाने के बाद हरियाणा के कई इलाकों में हिंसा भड़क गई थी। आरोप था कि कैथल के कलायत में उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड (यूएचबीवीएन) के कार्यालय में तोड़फोड़ की गई और आग लगा दी गई।

इस मामले में चार लोगों के खिलाफ राजद्रोह, आगजनी और शरारत समेत विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। निचली अदालत ने सबूतों के अभाव में चारों आरोपियों को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ हरियाणा सरकार हाईकोर्ट पहुंची थी।

आरोपियों की पहचान-साक्ष्य साबित नहीं कर पाया सरकारी पक्ष
हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार की अपील खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों की पहचान और उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने में विफल रहा। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य केवल सरकार के खिलाफ नारेबाजी की ओर संकेत करते हैं, जो असहमति व्यक्त करने का माध्यम हो सकता है, लेकिन इसे सरकार के प्रति घृणा या तिरस्कार फैलाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति पर राजद्रोह का मुकदमा चलाने के लिए ठोस और स्पष्ट साक्ष्य आवश्यक हैं। केवल विरोध प्रदर्शन या नारेबाजी के आधार पर इस गंभीर अपराध की धाराएं नहीं लगाई जा सकतीं।

 

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