MP में स्कूल टीचर्स की भर्ती पर बड़ा फैसला, ग्वालियर हाईकोर्ट ने अंग्रेजी अनिवार्यता पर सुनाया अहम आदेश

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ग्वालियर 

एमपी में मिडिल स्कूल टीचर्स बनने के लिए अंग्रेजी जरूरी हो गई है। इस संबंध में हाईकोर्ट का अहम फैसला आया है। कोर्ट ने कहा है कि स्नातक में अंग्रेजी विषय अनिवार्य है तभी मिडिल स्कूल शिक्षक बन सकेंगे। मप्र उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। खंडपीठ ने शिक्षक भर्ती को लेकर यह अहम फैसला सुनाया है। ग्वालियर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी अभ्यर्थी के पास स्नातक स्तर पर संबंधित विषय की डिग्री नहीं है, तो केवल उच्च शैक्षणिक योग्यता के आधार पर उसे मिडिल स्कूल शिक्षक पद पर नियुक्ति नहीं दी जा सकती। इसी के साथ हाईकोर्ट में दायर याचिका भी खारिज कर दी।

हाईकोर्ट का यह मामला माध्यमिक शिक्षक परीक्षा- 2018 से जुड़ा है। याचिकाकर्ता पवन कुमार मिश्रा ने शिक्षक भर्ती के प्रावधानों को चुनौती दी थी। उन्होंने उच्च योग्यता के आधार पर नियुक्ति पर विचार करने की मांग की थी पर सरकार ने कोर्ट में इसे नियमों के विपरीत बताया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने लोक शिक्षण आयुक्त को नियमों के विपरीत कोई निर्देश देने से स्पष्ट तौर पर इंकार कर दिया।

याचिकाकर्ता पवन कुमार मिश्रा माध्यमिक शिक्षक परीक्षा- 2018 की भर्ती प्रक्रिया में शामिल हुए थे। उन्होंने अंग्रेजी विषय के शिक्षक पद के लिए आवेदन किया था, लेकिन चयन प्रक्रिया के दौरान विभाग ने नियुक्ति इस आधार पर निरस्त कर दी कि उनके पास स्नातक स्तर पर अंग्रेजी विषय नहीं था। पवन कुमार मिश्रा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इसे चुनौती दी थी।

याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि वे अंग्रेजी विषय में स्नातकोत्तर हैं। उनकी उच्च योग्यता को पात्रता मानते हुए नियुक्ति पर विचार किया जाए। इधर सरकार ने इसे भर्ती नियमों के विपरीत बताया।

ग्वालियर हाईकोर्ट की डबल बेंच ने याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार के तर्क पर सहमति जताई। इसी के साथ कोर्ट ने 'खेल के बीच में नियम नहीं बदले जा सकते' सिद्धांत को दोहराते हुए याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट- नियमों के विपरीत नहीं दे सकते निर्देश
डबल बेंच ने कहा कि भर्ती नियम वैधानिक और बाध्यकारी होते हैं। यदि बाद में नियमों में ढील दी जाती है तो उन हजारों अभ्यर्थियों के साथ अन्याय होगा, जिन्होंने विज्ञापन की शर्तों के कारण आवेदन ही नहीं किया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा कोई नियम प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसमें पोस्ट ग्रेजुएशन को ग्रेजुएशन के समकक्ष माना गया हो। इसलिए लोक शिक्षण आयुक्त को नियमों के विपरीत कोई निर्देश नहीं दिया जा सकता।

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