अंतरराष्ट्रीय चूरमा दिवस: पारंपरिक देसी खुराक को मिलेगी वैश्विक पहचान, खास तैयारियां शुरू

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झज्जर.

आधुनिकता की अंधी दौड़ और डिब्बाबंद खान-पान के इस दौर में जहां हमारी पारंपरिक देसी खुराकें लुप्त होने की कगार पर हैं, वहीं अपनी सांस्कृतिक विरासत और गांव-देहात की अनमोल पहचान को वैश्विक पटल पर चमकाने के लिए एक बेहद अनूठी मुहिम की शुरुआत की गई है।

''खाओ चूरमा, बनो सूरमा'' के बुलंद और ओजस्वी नारे के साथ 13 जुलाई 2026 को दुनिया भर में ''तीसरा अंतरराष्ट्रीय चूरमा दिवस'' बेहद गौरवमयी अंदाज में मनाया जाएगा। दरअसल, इस वैश्विक मुहिम की नींव आज से ठीक तीन साल पहले 13 जुलाई 2024 को रखी गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण अंचलों के पारंपरिक खान-पान का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार करना रहा। इस मुहिम के प्रणेता झज्जर के लाडले और यूके के काउंसलर रोहित अहलावत ने दुनिया भर के प्रवासी भारतीयों और अपनी संस्कृति से प्यार करने वाले लोगों से इस ऐतिहासिक दिन को एक उत्सव के रूप में मनाने की भावुक अपील की है।

बाजारीकरण के दौर में देसी पहचान की लड़ाई
काउंसलर रोहित अहलावत का मानना है कि आज के समय में हर छोटी-बड़ी पश्चिमी चीज़ का बड़े स्तर पर प्रचार करके उसे हमारे घरों तक पहुंचा दिया गया है, लेकिन हमारे गांवों की असली पहचान, स्वाद और सेहत का खजाना रही मुख्य खुराक ''चूरमा'' को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह गौरव और पहचान नहीं मिल सकी है, जिसकी यह हकदार है। यह मुहिम इसी खाई को पाटने और भावी पीढ़ी को अपनी पौष्टिक विरासत से रूबरू कराने का एक जीवंत प्रयास है।

मेडलवीर खिलाड़ियों और सरहद के सूरमाओं की असली ताकत 
देखा जाए तो चूरमे का इतिहास केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शारीरिक बल और अदम्य साहस का प्रतीक भी रहा है। खेल के मैदानों में जब देश के पहलवान, मुक्केबाज और धावक अपनी ताकत का लोहा मनवाते हुए देश के लिए मेडल जीतते हैं, तो वे अपनी इस अपार सफलता के पीछे अपनी इसी देसी खुराक और मां के हाथ के बने चूरमे का ज़िक्र गर्व से करते हैं। इसके साथ ही, देश की सीमाओं पर तैनात जवान भी जब छुट्टियों के बाद अपनी ड्यूटी पर लौटते हैं, तो अपने साथ मां के प्यार से लिपटा चूरमा लेकर जाते हैं, जो महीनों तक बिना खराब हुए उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी ऊर्जा और शक्ति प्रदान करता है।

13 जुलाई को हर घर में महकेगा पारंपरिक स्वाद
काउंसलर रोहित अहलावत ने सभी देशवासियों और वैश्विक नागरिकों से अनुरोध किया है कि इस मुहिम को एक जन-आंदोलन का रूप दें। उन्होंने अपील की है कि आगामी 13 जुलाई 2026 को सभी लोग अपने-अपने घरों में शुद्ध देसी घी और गुड़-शक्कर का पारंपरिक चूरमा अनिवार्य रूप से बनाएं। बच्चों के स्कूल के लंच बाक्स में चूरमा भेजें ताकि नई पीढ़ी को इस स्वाद और इसके महत्व का पता चल सके। नौकरीपेशा और व्यवसायी लोग अपने कार्यस्थल पर भी अपनी इस पारंपरिक धरोहर को साथ लेकर जाएं और अपने साथियों के साथ साझा करें। ऐसा करने से हम अपनी गौरवशाली संस्कृति, बेमिसाल स्वाद तथा सेहतमंद विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई और अमिट पहचान दिला पाएंगे।

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