1902 के सर्वे से लेकर 2026 के फैसले तक ऐतिहासिक तथ्य उजागर, मस्जिद से पहले सरस्वती मंदिर होने के दावे पर चर्चा तेज

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 इंदौर

 98 दिन चले एएसआई सर्वे में भोजशाला परिसर में कई मूर्तियां, सिक्के, स्तंभ और पत्थरों पर संस्कृत में लिखे श्लोक मिले। एडवोकेट विष्णु शंकर जैन और महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने अयोध्या फैसले का आधार देते हुए तर्क रखा कि किसी एक समुदाय द्वारा उपयोग करने से दूसरे समुदाय के धार्मिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते।
ऐतिहासिक सर्वे और प्राचीन साक्ष्य

वकीलों ने कोर्ट को बताया कि लगभग सवा सौ साल पहले हुए सर्वे में सिद्ध हो चुका है कि धार भोजशाला सरस्वती मंदिर ही है। उस वक्त सर्वे में मिले साक्ष्य इसकी पुष्टि भी करते हैं। यह सर्वे वर्ष 1902 में एएसआई ने किया था। सर्वे से यह बात भी सिद्ध हुई कि भोजशाला का अस्तित्व मस्जिद से बहुत पहले से है। भोजशाला के पत्थरों को ही मस्जिद बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया था।

लिपि विश्लेषण और निर्माण काल का प्रमाण

उज्जैन के जूना महाकालेश्वर मंदिर में लगे पत्थर पर लिखी लिपि और भोजशाला के पत्थरों पर लिखी लिपि एक ही समय की है। इससे यह सिद्ध हुआ कि भोजशाला मंदिर है और इसका निर्माण मस्जिद से बहुत पहले हो चुका था। वकीलों ने हदीस का हवाला दिया और कहा कि इस्लाम के अनुसार जबरन जमीन लेकर मस्जिद बनाई ही नहीं जा सकती।

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मस्जिद पक्ष की दलीलें जो निरस्त हो गई

 पूजा स्थल अधिनियम 1991 को लेकर रखे गए तर्क कोर्ट ने अस्वीकार कर दिए। कोर्ट ने कहा कि पुरातत्व महत्व की संरक्षित धरोहरों पर यह लागू नहीं होता।
    
मस्जिद पक्ष ने तर्क रखा कि विवाद 2003 के आदेश को लेकर है। याचिका आदेश के 19 वर्ष बाद दायर हुई है, समय सीमा के बाहर है, लेकिन कोर्ट ने इन तर्कों को अस्वीकार कर दिया।
   
 मस्जिद पक्ष ने तर्क रखा था कि स्वामित्व का निर्धारण आस्था और विश्वास से नहीं बल्कि कानूनी प्रक्रिया से किया जा सकता है। अयोध्या मामले में रामलला विराजमान पक्षकार थे, लेकिन भोजशाला मामले में ऐसा नहीं है, लेकिन कोर्ट ने इसे अस्वीकार कर दिया।

मस्जिद पक्ष की ओर से एडवोकेट सलमान खुर्शीद ने कहा कि राजा भोज की मृत्यु के बाद कई बार धार को लूटा गया, हिंदू राजाओं ने ही मंदिरों में की तोड़फोड़ की थी, लेकिन साक्ष्य के अभाव में कोर्ट ने इसे नहीं माना।
मस्जिद पक्ष का कहना था कि धार दरबार ने वर्ष 1935 में ही स्पष्ट कर दिया था कि भोजशाला में नमाज की अनुमति देते हुए इसे मस्जिद मान लिया था, लेकिन तर्क अस्वीकार कर दिया गया।

 

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