सरकारी संपत्ति की सुरक्षा में लापरवाही पर हाईकोर्ट सख्त, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश

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 जबलपुर
 हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने सरकारी संपत्ति की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी संपत्ति की रक्षा करना सरकार और उसके अधिकारियों का संवैधानिक दायित्व है। इसमें किसी भी तरह की लापरवाही जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात मानी जाएगी।

अदालत ने कहा कि सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा में नाकाम रहने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की जानी चाहिए। इसके साथ ही आवश्यकता पड़ने पर ऐसे अधिकारियों के खिलाफ एफआइआर भी दर्ज की जा सकती है।

वर्षों तक फाइल दबाए रखने वालों को संदेश
हाई कोर्ट का यह आदेश सरकारी जमीन से जुड़े मामलों में लंबे समय तक कार्रवाई नहीं करने वाले अधिकारियों के लिए सख्त संदेश माना जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि यदि अधिकारियों की लापरवाही के कारण सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचता है तो केवल सरकारी खजाने पर इसका भार नहीं डाला जा सकता। ऐसी स्थिति में जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। कोर्ट ने प्रशासनिक निष्क्रियता को केवल सामान्य चूक नहीं माना, बल्कि इसे जनता की संपत्ति की सुरक्षा के संवैधानिक दायित्व की अनदेखी बताया।

बैतूल की 5.5 हेक्टेयर सरकारी जमीन का मामला
यह मामला बैतूल जिले के सूरगांव स्थित करीब 5.5 हेक्टेयर सरकारी भूमि के विवाद से जुड़ा है। इस मामले में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जो वर्ष 2004 के निर्णय के खिलाफ लगभग 12 साल बाद दायर की गई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि संबंधित अधिकारियों को मामले की पूरी जानकारी थी, इसके बावजूद उन्होंने समय रहते आवश्यक कानूनी कदम नहीं उठाए। अदालत ने इसे गंभीर लापरवाही माना।

सार्वजनिक संसाधनों की सरकार ट्रस्टी
अपने आदेश में हाई कोर्ट ने पब्लिक ट्रस्ट डाक्ट्रिन का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार सार्वजनिक संसाधनों की मालिक नहीं, बल्कि उनकी ट्रस्टी होती है। इसलिए सरकारी जमीन को निजी हाथों में जाने से रोकना अधिकारियों की जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण में विफल रहने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही दोबारा न हो।

कलेक्टर से पटवारी तक जांच की अनुमति
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को तत्कालीन कलेक्टर, अतिरिक्त कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर, तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और पटवारियों के विरुद्ध विभागीय जांच शुरू करने की स्वतंत्रता दी है।

इसके अलावा कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जांच में जिम्मेदारी तय होती है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की कार्रवाई भी की जा सकती है।

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