पटना यूनिवर्सिटी की वो सुनहरी यादें, जब पढ़ाई के साथ गंगा किनारे बनते थे भविष्य के सपने

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पटना
 पटना विश्वविद्यालय को सिर्फ कक्षाओं, परीक्षाओं और डिग्रियों से समझना मुश्किल है। इसका असली संसार उन घंटों में भी बसता था, जो कक्षा में शिक्षक छात्र-छात्राओं को विषय के बारे में विस्तृत जानकारी देते थे।

यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए शिक्षकों द्वारा दी गई जानकारी ही सबसे बड़ा दस्तावेज होता था। गंगा गंगा की ओर खुलती खिड़कियों से आती हवा, पुराने बरामदों में चलती बहसें, पुस्तकालय में देर तक खुली किताबों ने यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को आकार दिया।

विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी पूंजी शायद उसके भवन नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी हजारों स्मृतियां हैं। पटना विवि के पूर्व छात्र और वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. आलोक कुमार ने यादें साझा की।

बताया कि यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों में अनुशासन के साथ शिक्षकों के प्रति सम्मान बहुत था। पढ़ाई के दौरान कोई भी विद्यार्थी कक्षा से बाहर इधर-उधर नहीं घूम सकता था। इसके लिए सख्त मनाही थी। विद्यार्थी पुस्तकालय में बैठ कर पुस्तकों का अध्ययन करते थे।

पटना विश्वविद्यालय में एडमिशन होना बड़ी बात थी
1965 में यहां मेरा नामांकन हुआ था। ज्यादातर छात्र-छात्राएं गांव देहात के होते थे। जो पारिवारिक रूप से कमजोर होते थे लेकिन पढ़ाई के मामले में इनका कोई जोर नहीं होता था।

पटना विश्वविद्यालय में नामांकन होना ही बड़ी बात होती थी। अच्छे अंकों के आधार और प्रतियोगिता लेकर नामांकन होता था। यहां स्नातक करने वाले बच्चों का सपना सिविल सर्विस में जाने का होता था।

पढ़ाई के साथ विद्यार्थी सिविल सेवा की तैयारी साथ में करते थे। इसका परिणाम हुआ कि प्रतिवर्ष यहां के छात्र-छात्राएं सिविल सेवा के लिए चयनित होकर विश्वविद्यालय का नाम बढ़ाते रहे। वहीं जो सिविल सेवा में नहीं गए वे प्रोफेसर बनते थे।

खेल के प्रति रहता था उत्साह
पढ़ाई के साथ यहां पढ़ने वाले बच्चों में खेल के प्रति काफी लगाव रहता था। उन दिनों फुटबाल काफी लोकप्रिय खेलों में से एक होता था। वैसे तो कालेज परिसर में टेनिस, बैंडमिंटन का भी महत्व था।

यहां पर बोटिंग क्लब हुआ करता था। विश्वविद्यालय परिसर से गंगा नजदीक होने के कारण बच्चे कुशल प्रशिक्षकों के निर्देशन में गंगा की लहरों पर बोटिंग का आनंद उठाते थे।

वहीं बच्चों के बीच वाद-विवाद प्रतियोगिता होती थी। इसके लिए बच्चों में काफी उत्साह होता था। प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए बच्चे पूरी तैयारी करके आते थे। यहां पर वार्षिक खेलकूद काफी रोमांच और आनंद के साथ मनाया जाता था।

इसके लिए काफी तैयारी होती थी। इस दौरान दानापुर से बिहार मिलिट्री का बैंड आता था। जीत के साथ बैंड धुन बजाता था। बच्चे भी अनुशासन के साथ कार्यक्रम का आनंद उठाते थे।

वहीं एक वर्ष बाद प्रो. महेंद्र प्रसाद प्राचार्य बने। वे अनुशासन प्रिय व्यक्ति थे। जिस क्लास में शिक्षक देर से आते थे वे वहां जाकर पढ़ाने लगते थे। नोटिस बोर्ड पर सूचना दी जाती थी। कालेज का ऐसा माहौल था कि सभी शिक्षक और कर्मचारी समय से पहले आ जाते थे।

पिंटू होटल का रसगुल्ला था लोकप्रिय
उन दिनों पिंटू होटल में भोजन करना बड़ी बात होती थी। वहां का समोसा और रसगुल्ला काफी लोकप्रिय होता था। कालेज में पढ़ने वाले बच्चे अपना पैकेट मनी बचा कर यदा-कदा यहां समोसा और रसगुल्ला का आनंद उठाते थे।

वहीं मनोरंजन के लिए उन दिनों शहर में छह सिनेमाघर हुआ करता था। रिजेंट, एलिफिस्टिन, पर्ल, वीणा, रुपक, अशोक आदि थे। कालेज में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं मनोरंजन के लिए सिनेमा का भी आनंद उठाते थे। ऐतिहासिक फिल्मों को देखने का आनंद कुछ और होता था।

दशहरा में होता था सांस्कृतिक कार्यक्रम
दशहरा के समय उन दिनों हर जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम की धूम रहती थी। गोविंद मित्रा रोड, लंगर टोली, हार्डिंग पार्क, पटना जंक्शन के सामने आदि स्थानों पर शास्त्रीय संगीत और नृत्य का शानदार आयोजन होता था।

देश के नामचीन कलाकारों में पंडित बिरजू महाराज, गिरिजा देवी, लच्छू महाराज आदि नामचीन कलाकार अपनी प्रस्तुति से लोगों को पूरी रात आनंदित करते थे।

दशहरा पर तीन से चार दिनों तक लगातार कार्यक्रम होता था। पूरा शहर जागता था। उन दिनों सुरक्षा व्यवस्था के साथ लोगों में एक दूसरे के प्रति भाईचारे और प्रेम का वातावरण था।

मेले घूमने के दौरान महिलाएं परिवार के साथ रात भर घूमते थे। कहीं कोई घटना नहीं होती थी। उन दिनों रिक्शा यातयात का प्रमुख साधन हुआ करता था। मेले में पांच एवं 10 रुपये घंटे के हिसाब से रिक्शे की बुकिंग होती थी। रिक्शा वाला पूरी रात लोगों को मेले का सैर कराता था।

अशोक राजपथ पर रहती थी चहल-पहल
पटना विश्वविद्यालय की कहानी अशोक राजपथ के बिना अधूरी है। विश्वविद्यालय से निकलते ही सड़क का संसार जैसे परिसर का विस्तार बन जाता था। किताबों की दुकानें, चाय की प्यालियां, दोस्तों की मंडलियां और आने-जाने वाले विद्यार्थियों की भीड़।

मानो अशोक राजपथ खुद एक खुली पाठशाला होती थी।किसी दुकान पर परीक्षा की तैयारी पर चर्चा होती तो कहीं साहित्य की नई किताब पर बहस। चाय के छोटे से गिलास के साथ बड़ी-बड़ी योजनाएं बनतीं।

किसी को प्रशासनिक सेवा में जाना था, किसी को साहित्य में पहचान बनानी थी तो कोई शोध की दुनिया में जाना चाहता था। इन सपनों का कोई औपचारिक पाठ्यक्रम नहीं था, लेकिन विश्वविद्यालय जीवन उन्हें दिशा देता था।

गंगा भी इस पूरे संसार की मौन साक्षी थी। शाम ढलते ही कई विद्यार्थी नदी किनारे पहुंच जाते। दिनभर की भाग दौड़ के बाद वहां बैठना, बातचीत करना और भविष्य के बारे में सोचना विद्यार्थी जीवन का हिस्सा था। गंगा की धारा और विश्वविद्यालय की हलचल के बीच जैसे एक पूरा शहर अपनी युवा ऊर्जा के साथ सांस लेता था।

 

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