लुधियाना में बहुओं ने सास की अर्थी को दिया कंधा, मौत के बाद आंखें और शरीर भी किया दान

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लुधियाना 

लुधियाना में महिला की मौत के बाद जब घर से उनकी अर्थी निकाली गई तो बहुओं ने एक नई मिसाल कायम की। दोनों बहुओं ने अपनी सास की अर्थी को आगे से अपने कंधों पर उठाया, जबकि दोनों बेटों ने पीछे से कंधा लगाकर मां को अंतिम विदाई दी।

घर से कुछ दूर तक बहुओं ने सास की अर्थी को कंधा दिया और उसके बाद शव हारमनी आयुर्वेदिक कॉलेज एंड हॉस्पिटल फिरोजपुर की मैनेजमेंट के हवाले कर दिया। शव लेकर अस्पताल की मैनेजमेंट फिरोजपुर के लिए रवाना हुई। मेडिकल कॉलेज में अब उनके शव पर स्टूडेंट्स प्रैक्टिकल करेंगे।

अंतिम यात्रा से पहले महिला सुखदेव कौर की आंखें भी दान की गई। आंखें डॉ रमेश सुपरस्पेशिलिटी आईएंड लेजर सेंटर को दी गई। उनकी आंखें भी किसी दृष्टिहीन को लगाई जाएंगी और वो भी दुनियां देख सकेंगे।

महिला अपने दो बेटों व बहुओं के साथ लुधियाना के प्रताप सिंह वाला में रहती थी। उन्होंने 10 साल पहले मरणोपरांत शरीर दान करने का फैसला किया था। उन्होंने बाकायदा इसके लिए फॉर्म भर दिया था। परिवार ने भी एफिडेविट दिया था कि उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।

परिवार व रिश्तेदारों ने ऐसे दी सुखदेव कौर को अंतिम विदाई…

    मौत होते ही आई हॉस्पिटल को किया फोन: सुखदेव कौर ने 10 साल पहले शरीर व आंखें दान करने का संकल्प लिया था। बुधवार शाम को जैसे ही सुखदेव कौर की हार्ट अटैक से मौत हुई तो बेटों यादविंदर सिंह व गुरविंदर सिंह ने डॉ रमेश सुपरस्पेशलिटी आई एंड लेजर सेंटर को फोन किया और मां की आंखों को ले जाने के लिए कहा। आई अस्पताल की टीम आई और उनकी आंखें लेकर चली गई।

    शरीर के लिए डेरे की टीम से किया संपर्क: सुखदेव कौर ने एक सत्संग के दौरान डेरे में शरीर दान का संकल्प लिया था। जब उनकी मौत हुई तो बेटों ने डेरे की टीम से संपर्क किया। हारमनी आयुर्वेदिक कॉलेज एंड हॉस्पिटल फिरोजपुर को शव लेने के लिए कहा। गुरुवार को अस्पताल की टीम शव लेने लुधियाना पहुंची।

    बहुओं ने दिया अर्थी को कांधा: धार्मिक रीति रिवाज निभाने के बाद अंतिम यात्रा की शुरुआत में समाज की पुरानी मान्यताओं को दरकिनार करते हुए सुखदेव कौर की दोनों बहुओं मनप्रीत कौर और राजवीर कौर ने अपनी सास की अर्थी को आगे से अपने कंधों पर उठाया, जबकि बेटे यादविंदर सिंह और गुरविंदर सिंह पीछे से सहारा बने।

    फूलों से सजी एंबुलेंस को दी हरी झंडी: पार्थिव शरीर को एंबुलेंस में सम्मानपूर्वक रखा गया और पूरे वाहन को फूलों से सजाया गया। गांव प्रताप सिंह वाला के सरपंच गुरमेज सिंह ने हरी झंडी दिखाकर एम्बुलेंस को फिरोजपुर के मेडिकल कॉलेज के लिए रवाना किया। अंतिम विदाई के दौरान उपस्थित परिजनों, रिश्तेदारों और ग्रामीणों ने उनकी इस अंतिम सेवा और त्याग को नमन किया।

मेडिकल छात्रों की पढ़ाई और शोध में आएगा काम गांव प्रताप सिंह वाला के सरपंच गुरमेज सिंह कामरेड ने कहा कि इंसानी शरीर मृत्यु के बाद मिट्टी में मिल जाता है, लेकिन सुखदेव कौर का यह शरीर अब अमर हो गया है। वे बेहद सहृदय और मीठे स्वभाव की महिला थीं, जो हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहती थीं। उनके जाने से गांव को अपूरणीय क्षति हुई है, लेकिन उनके परिवार ने शरीरदान करके पूरे समाज को एक मिसाल दी है।

उन्होंने आगे कहा कि शरीरदान की मुहिम बेहद सराहनीय है। इस पार्थिव देह पर हारमनी आयुर्वेदिक कॉलेज एंड हॉस्पिटल फिरोजपुर के छात्र प्रैक्टिकल करेंगे और बीमारियों पर शोध करेंगे, जो भविष्य में मानव जाति के इलाज के काम आएगा।

शरीर दान की प्रक्रिया जानिए…
    जीवनकाल में संकल्प व पंजीकरण:
जब कोई व्यक्ति जीवित रहते हुए शरीरदान का फैसला करता है, तो उसे किसी नजदीकी मेडिकल कॉलेज या अधिकृत संस्थान में जाकर बॉडी डोनेशन फॉर्म भरना होता है, जिसमें उसकी स्पष्ट सहमति दर्ज होती है। इस आवेदन पत्र में परिवार के सदस्यों या नॉमिनी का विवरण भी लिया जाता है, जिसके बाद संस्थान आवेदक को एक औपचारिक पंजीकरण या शपथ पत्र जारी कर देता है।

    परिवार को सूचित करना: शरीरदान की प्रक्रिया को सुचारू रूप से पूरा करने के लिए यह बेहद जरूरी है कि व्यक्ति अपने फैसले की जानकारी अपने निकटतम परिजनों को पहले से दे दे। व्यक्ति की मृत्यु के तुरंत बाद परिवार के सदस्यों को ही संबंधित मेडिकल कॉलेज या संस्थान से संपर्क करके दान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होता है।

    मृत्यु के बाद संस्थान को सूचना: डॉक्टर द्वारा मृत्यु की पुष्टि किए जाने के बाद परिजनों को बिना किसी देरी के मेडिकल कॉलेज को तुरंत सूचित करना चाहिए। इसके बाद संस्थान के विशेषज्ञ यह जांचते हैं कि क्या शरीर उनके निर्धारित मानकों और स्वीकार्यता की शर्तों के अनुसार सही स्थिति में है।

    जरूरी दस्तावेजों की पूर्ति: प्रक्रिया को कानूनी रूप से पूरा करने के लिए मृत्यु प्रमाणपत्र, पहले से भरा हुआ संकल्प-पत्र, मृतक व उनके निकट संबंधी के पहचान पत्र और संस्थान का निर्धारित सहमति फॉर्म तैयार रखना होता है।

    मेडिकल कॉलेज को शव सौंपना: सभी कागजी प्रक्रियाएं और प्राथमिक जांच पूरी होने के बाद पार्थिव देह को सम्मानपूर्वक मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी डिपार्टमेंट को सौंप दिया जाता है, जहां इसका उपयोग मेडिकल छात्रों के प्रैक्टिकल, अध्ययन और जटिल बीमारियों पर शोध के लिए किया जाता है।

    अंतिम संस्कार की प्रक्रिया: शोध व अध्ययन का कार्य पूरा हो जाने के बाद संबंधित संस्थान अपनी नीतियों के तहत शव का अंतिम संस्कार करता है। कई मामलों में परिजनों की इच्छा अनुसार उन्हें भी इस प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर दिया जाता है।

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