यूपी में गोशालाओं को मिलेगा नया बिजनेस मॉडल, जैविक खेती पर जोर

Editor
3 Min Read
यूपी में गोशालाओं को मिलेगा नया बिजनेस मॉडल, जैविक खेती पर जोर
WhatsApp Share on WhatsApp
add_action('wp_footer', 'jazzbaat_new_version_modal'); function jazzbaat_new_version_modal() { ?>
SW24news • Beta

लखनऊ

 उत्तर प्रदेश में कृषि और पशुपालन के एकीकरण से ग्रामीण समृद्धि का नया अध्याय शुरू होने जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विजन के अनुरूप, प्रदेश सरकार ने अब राज्य की गोशालाओं को आत्मनिर्भर 'बिजनेस मॉडल' के रूप में ढालने की तैयारी कर ली है। सरकार का लक्ष्य गोबर आधारित कम्पोस्ट, बायोगैस, जीवामृत और घनामृत के उत्पादन को वैज्ञानिक पद्धति से जोड़कर एक मजबूत मार्केटिंग नेटवर्क स्थापित करना है।

केमिकल मुक्त खेती और मिट्टी की उर्वरता पर फोकस
पशुपालन मंत्री धर्मपाल सिंह ने हाल ही में कृषि और पशुपालन विभाग के अधिकारियों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक में स्पष्ट किया कि सरकार की प्राथमिकता रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाकर जैविक खेती को मुख्यधारा में लाना है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देशित किया है कि प्रदेश में उपलब्ध लाखों मीट्रिक टन गोबर का वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण कर उच्च गुणवत्ता वाली खाद बनाई जाए। गोबर खाद के उपयोग से मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा बढ़ाकर बंजर होती जमीन को फिर से उपजाऊ बनाने पर जोर दिया जाए।

सफल मॉडलों का होगा प्रदेशव्यापी विस्तार
झांसी, चंदौली, कानपुर और बाराबंकी जैसे जिलों में बायोगैस और जैविक खाद के सफल प्रयोगों को अब पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा।

    दोहरा लाभ: किसानों को बायोगैस से सस्ती ऊर्जा मिलेगी और संयंत्र से निकलने वाली 'स्लरी' का उपयोग खेतों में सर्वोत्तम खाद के रूप में होगा।

    सीबीजी प्लांट: प्रदेश भर में कम्प्रेश्ड बायोगैस (CBG) संयंत्रों के जाल को विस्तार देने की योजना है, जिससे कचरे से कंचन बनाने की राह आसान होगी।

मार्केटिंग और मानकीकरण
सरकार केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है। असली जोर गुणवत्ता और ब्रांडिंग पर है।

    मानकीकरण: खाद की पैकेजिंग, नमी और पोषक तत्वों के कड़े मानक तय किए जाएंगे ताकि किसानों का भरोसा बढ़े।

    सहकारी नेटवर्क: सहकारी समितियों के माध्यम से जैविक उत्पादों की सुगम उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।

    रिसर्च: कृषि विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिकों को जिम्मेदारी दी गई है कि वे कम लागत वाले सरल मॉडल विकसित करें, जिन्हें आम किसान भी अपना सके।

 

Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *