मुख्यमंत्री डॉ. यादव जैन मुनि आचार्य के पावन सान्निध्य में आयोजित भव्य प्रतिष्ठा महोत्सव में हुए सम्मिलित

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मुख्यमंत्री डॉ. यादव जैन मुनि आचार्य  के पावन सान्निध्य में आयोजित भव्य प्रतिष्ठा महोत्सव में हुए सम्मिलित
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भोपाल 

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि किसी देवस्थान की प्राण प्रतिष्ठा और संतों का सान्निध्य कई जन्मों के पुण्य के बाद ही प्राप्त होता है। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा को भारतीय संस्कृति की अमर धरोहर बताते हुए कहा कि ईश्वर संतों के माध्यम से ही समाज को मार्ग भटकने से बचाते हैं। उन्होंने जैन धर्म के "जियो और जीने दो" के मूल मंत्र और अहिंसा के मार्ग पर विशेष बल दिया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि भारतीय संस्कृति हमें सिखाती है कि जीवन का प्रत्येक क्षण और व्यवस्था का प्रत्येक कण लोक-कल्याण के लिए सदुपयोग में आना चाहिए। मानवता और जीव मात्र के प्रति करुणा भाव रखना ही हमारी संस्कृति का आधार है।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव रविवार को इंदौर में जैन समाज के 'प्रतिष्ठा महोत्सव' एवं 'लाभार्थी बहुमान समारोह' में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। मुख्यमंत्री द्वारा गच्छाधिपति आचार्यदेव मद्विजय हितेश्चन्द्रसूरीश्वरजी महाराज साहिब का भावपूर्ण पूजन-वंदन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने मोहनखेड़ा तीर्थ से अपने आत्मीय और गहरे जुड़ाव को भी साझा किया। उन्होंने रोचक ढंग से उल्लेख किया कि आचार्य  ने इस पावन तीर्थ का नाम उनके नाम (मोहन) पर ही रखा है, जो उनके लिए व्यक्तिगत रूप से अत्यंत आनंद और गौरव का विषय है। उन्होंने मोहनखेड़ा तीर्थ को न केवल प्रदेश, बल्कि पूरे देश और दुनिया के लिए श्रद्धा एवं आस्था का एक प्रमुख केंद्र बताया। उन्होंने विश्वास जताया कि ऐसे आध्यात्मिक आयोजनों से समाज में सकारात्मक ऊर्जा और समरसता का संचार होता है। मुख्यमंत्री ने सफल आयोजन के लिए समस्त ट्रस्टी परिवार और आयोजन समितियों को बधाई दी और आश्वस्त किया कि प्रदेश सरकार भविष्य में भी ऐसे आध्यात्मिक और सामाजिक कार्यों में हर संभव सहयोग प्रदान करती रहेगी।

आचार्य  हितेश्चन्द्रसूरीश्वरजी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में मुख्यमंत्री डॉ. यादव के सरल स्वभाव और धर्म के प्रति उनकी अटूट निष्ठा की प्रशंसा की। आचार्य  ने कहा कि जब शासन और साधना का समन्वय होता है, तभी राष्ट्र उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होता है। उन्होंने मुख्यमंत्री को आशीर्वाद देते हुए कहा कि जिस प्रकार वे जनसेवा के कार्यों में संलग्न हैं, उसी प्रकार धर्म और संस्कृति के संरक्षण में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण है। आचार्य  ने प्रतिष्ठा महोत्सव के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ऐसे आयोजन आत्मा की शुद्धि और समाज में सद्भावना बढ़ाने का कार्य करते हैं। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को धर्म के मार्ग पर अडिग रहने और जीव मात्र के प्रति करुणा भाव रखने की प्रेरणा दी।

 

 

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