बलवंत सिंह राजोआना की फांसी पर केंद्र का बड़ा फैसला, SC में सजा माफी का किया विरोध; 28 को सुनवाई

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नई दिल्ली
केंद्र सरकार ने पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की 1995 में हुई हत्या के मामले में मौत की सजा पाए दोषी बलवंत सिंह राजोआना की उस याचिका का विरोध किया है जिसमें उन्होंने अपनी सजा को कम करने की मांग की है।30 से अधिक वर्षों से हिरासत में रह रहे राजोआना ने राष्ट्रपति के समक्ष 2012 से लंबित दया याचिका पर निर्णय में देरी के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया।

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया, “हमें उनकी मांगों पर आपत्ति है। राज्य [पंजाब] में मौजूदा स्थिति को देखते हुए, कोई भी निर्णय लेना उचित नहीं होगा।”

केंद्र सरकार द्वारा याचिका का विरोध किए जाने के मद्देनजर, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और अपारेश कुमार सिंह सहित पीठ ने कहा कि वह मामले की सुनवाई गुण-दोष के आधार पर करेगी।"चूंकि अब वे अपनी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलने पर जोर दे रहे हैं, जिसका आप विरोध कर रहे हैं, इसलिए हम मामले की योग्यता के आधार पर सुनवाई करेंगे," पीठ ने कहा।श्री नटराज द्वारा मामले की तैयारी के लिए समय मांगे जाने के बाद अदालत ने मामले की सुनवाई 28 अक्टूबर को तय की।

बब्बर खालसा के उग्रवादी राजोआना को तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या में उनकी भूमिका के लिए दोषी ठहराया गया था। बेअंत सिंह की हत्या 31 अगस्त, 1995 को चंडीगढ़ में पंजाब और हरियाणा सिविल सचिवालय के बाहर एक आत्मघाती बम विस्फोट में हुई थी। इस विस्फोट में हमलावर दिलावर सिंह और 17 अन्य लोग भी मारे गए थे।

एक विशेष अदालत ने जुलाई 2007 में रजोआना को मृत्युदंड सुनाया था, जिसे पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने 2010 में बरकरार रखा था। उनकी फांसी 31 मार्च, 2012 को तय की गई थी, लेकिन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) द्वारा उनकी ओर से दया याचिका प्रस्तुत करने के बाद इसे स्थगित कर दिया गया था।

14 साल से राष्ट्रपति के पास लंबित है दया याचिका
राजोआना की याचिका का मुख्य आधार उसकी दया या
चिका पर लंबे समय से फैसला नहीं होना है। राजोआना की ओर से दलील दी गई है कि उसकी दया याचिका वर्ष 2012 से राष्ट्रपति के पास लंबित है।

14 साल से अधिक समय तक फांसी की सजा के अनिश्चित भविष्य में रहने से उसे मानसिक पीड़ा और असहनीय तनाव का सामना करना पड़ा है। याचिका में कहा गया है कि दया याचिका पर फैसला लेने में इतनी लंबी देरी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार से जुड़ा मुद्दा है।

राजोआना के वकील की ओर से सुप्रीम कोर्ट के उन पूर्व फैसलों का भी हवाला दिया जाएगा, जिनमें दया याचिका पर अत्यधिक देरी को मृत्युदंड को उम्रकैद में बदलने के आधार के रूप में स्वीकार किया गया है। 23 सितंबर को वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि राजोआना अब मुख्य रूप से मृत्युदंड को उम्रकैद में बदलने के मुद्दे पर जोर दे रहा है।

31 अगस्त 1995 को हुआ था बम विस्फोट
बलवंत सिंह राजोआना को 31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ स्थित पंजाब सिविल सचिवालय के बाहर हुए आत्मघाती बम विस्फोट मामले में दोषी ठहराया गया था। इस विस्फोट में तत्कालीन पंजाब मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और 16 अन्य लोगों की मौत हुई थी। जांच में राजोआना को मामले में बैकअप बम हमलावर बताया गया था।

विशेष अदालत ने जुलाई 2007 में राजोआना को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। इसके बाद पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने वर्ष 2010 में उसकी सजा को बरकरार रखा। राजोआना को 31 मार्च 2012 को फांसी दी जानी थी, लेकिन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) की ओर से उसकी ओर से दया याचिका दाखिल किए जाने के बाद फांसी पर रोक लगा दी गई। इसके बाद से उसकी दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित है।

2019 में केंद्र ने रखा था सजा कम करने का प्रस्ताव
राजोआना की सजा को लेकर वर्ष 2019 में केंद्र सरकार ने भी पहल की थी। गृह मंत्रालय ने गुरु नानक देव जी की 550वीं जयंती के अवसर पर राजोआना की मृत्युदंड की सजा को उम्रकैद में बदलने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि यह प्रस्ताव औपचारिक रूप से लागू नहीं हो सका।

इसके बाद राजोआना ने वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और केंद्र के प्रस्ताव को लागू करने के साथ-साथ उसकी दया याचिका पर फैसला करने की मांग की। इस दौरान केंद्र ने अदालत को बताया था कि मामले में फैसला टाल दिया गया है। दया याचिका पर लंबे समय से फैसला नहीं होने के कारण यह मामला कई बार सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया है।

पंजाब के मौजूदा माहौल का दिया हवाला
इस बार केंद्र ने राजोआना की सजा कम करने का स्पष्ट रूप से विरोध किया है। केंद्र का ताजा रुख ऐसे समय आया है जब पंजाब में राजनीतिक और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दे संवेदनशील बने हुए हैं।

हालांकि, केंद्र ने अदालत के समक्ष मौजूदा परिस्थितियों का हवाला देते हुए सजा कम करने को अनुकूल नहीं बताया है। अब सुप्रीम कोर्ट 28 अक्टूबर को केंद्र के विरोध और राजोआना की ओर से सजा में देरी को आधार बनाकर दायर याचिका पर विस्तार से सुनवाई करेगा।

 

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