कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में सवालों का जंगल! 6 हजार लिए तो 5 हजार की रसीद क्यों?

Editor
4 Min Read

कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में सवालों का जंगल! 6 हजार लिए तो 5 हजार की रसीद क्यों?

मनेन्द्रगढ़/एमसीबी

कुंवारपुर वन परिक्षेत्र एक ओर अपनी प्राकृतिक संपदा और जैव विविधता के लिए जाना जाता है, तो दूसरी ओर अब यहां की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवाल विभागीय पारदर्शिता पर गंभीर बहस खड़ी कर रहे हैं। ग्राम जरडोल-पतवाही में निस्तार की अनुमति, पौधारोपण और कथित आर्थिक लेन-देन को लेकर ग्रामीणों के आरोपों ने वन विभाग की व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि निस्तार की अनुमति देने में समानता नहीं बरती गई। किसी को अनुमति मिली तो किसी को कथित तौर पर अधिकार से वंचित किया गया। यदि यह आरोप सही है तो सवाल सीधा है, क्या जंगल के नियम सबके लिए समान हैं या सुविधा के हिसाब से उनके अर्थ बदल जाते हैं?

6 हजार की बात, रसीद 5 हजार की, बीच का एक हजार आखिर गया कहां?

मामले का सबसे गंभीर सवाल कथित 6,000 के भुगतान और 5,000 की रसीद से जुड़ा है। एक ग्रामीण के अनुसार उससे 6,000 लिए गए, लेकिन रसीद देने में आनाकानी हुई। बाद में कथित रूप से 5,000 की मनी रसीद सामने आई।
अब सवाल केवल 1,000 का नहीं है। सवाल है हिसाब का, रसीद का और सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता का।
यदि ग्रामीण का आरोप गलत है तो विभाग को सामने आकर स्पष्ट करना चाहिए कि वास्तविक भुगतान कितनी राशि का था, किस मद में लिया गया और आधिकारिक रसीद में कितनी राशि दर्ज है। आखिर सरकारी लेन-देन में एक-एक रुपये का हिसाब होना चाहिए, फिर 1,000 का अंतर सवालों से बाहर कैसे रह सकता है?

पौधारोपण के बीच निस्तार के नियम भी कठघरे में

पौधारोपण पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन इसकी आड़ में यदि निस्तार अधिकार, वनभूमि अथवा अनुमति प्रक्रिया को लेकर असमानता के आरोप सामने आते हैं तो विभाग की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।ग्रामीणों की शिकायतों को केवल आरोप मानकर किनारे करने के बजाय संबंधित दस्तावेजों, निस्तार अनुमति, मनी रसीद, वनभूमि और पौधारोपण स्थल का मौके पर सत्यापन कराया जाना चाहिए। कागजों में सब कुछ सही दिखना अलग बात है और जमीन पर व्यवस्था सही होना अलग।

अब जांच ही बताएगी, नियम चले या मनमानी?

कुंवारपुर वन परिक्षेत्र से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच इसलिए जरूरी है, क्योंकि मामला केवल निस्तार अनुमति तक सीमित नहीं है। पौधारोपण, वनभूमि और कथित आर्थिक लेन-देन से जुड़े सवाल भी सामने आ रहे हैं। ग्रामीणों के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जाना चाहिए। लेकिन विभाग और जिला प्रशासन से यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि यदि सब कुछ नियमानुसार है तो दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करने में परेशानी क्या है? कुंवारपुर के जंगल में पेड़ कितने लगाए गए, निस्तार की अनुमति किसे मिली, किस आधार पर मिली और 6,000 बनाम 5,000 की रसीद का रहस्य क्या है, इन सवालों का जवाब अब जांच से मिलना चाहिए, क्योंकि सवाल जंगल का नहीं, व्यवस्था पर भरोसे का है।

TAGGED:
Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

YouTube Reporters Support Directors Live