ऑनलाइन नामांकन नहीं कराने पर चुनाव आयुक्त मुश्किल में, पंजाब हाई कोर्ट ने भेजा अवमानना नोटिस

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ऑनलाइन नामांकन नहीं कराने पर चुनाव आयुक्त मुश्किल में, पंजाब हाई कोर्ट ने भेजा अवमानना नोटिस
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चंडीगढ़.

पंजाब में स्थानीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों के दौरान नामांकन प्रक्रिया में हिंसा, अव्यवस्था और उम्मीदवारों के साथ कथित उत्पीड़न के मुद्दे पर दायर जनहित याचिका अब अवमानना कार्रवाई तक पहुंच गई है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब के राज्य चुनाव आयुक्त राज कुमार चौधरी (आईएएस सेवानिवृत्त) को नोटिस जारी हुआ है। 

उन्हें ये नोटिस अदालत के आदेशों की कथित जानबूझकर अवहेलना के मामले में जारी कर जवाब तलब किया है। यह आदेश जस्टिस विकास बहल की अदालत ने अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। याचिका हाई कोर्ट के वकील निखिल थम्मन ने दायर की है। अदालत ने नोटिस जारी करते हुए राज्य चुनाव आयुक्त से पूछा है कि पूर्व आदेशों का पालन न करने पर उनके खिलाफ अवमानना कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। अगली सुनवाई 27 मई 2026 तय की गई है। 

वैकल्पिक ऑनलाइन नामांकन प्रणाली की मांग
याचिकाकर्ता का आरोप है कि पंजाब में नगर निगम, नगर परिषदों और पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों के लिए वैकल्पिक ऑनलाइन नामांकन प्रणाली लागू करने संबंधी उनकी प्रतिनिधित्व याचिका पर हाई कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद निर्धारित समयसीमा में निर्णय नहीं लिया गया। इससे अदालत के आदेशों की अवहेलना हुई। दरअसल, इससे पहले दायर जनहित याचिका में निखिल थम्मन ने स्थानीय चुनावों में नामांकन दाखिल करने के दौरान बार-बार सामने आने वाली हिंसा, नामांकन पत्र फाड़ने, उम्मीदवारों को शारीरिक रूप से रोकने, धमकाने और चुनावी अराजकता की घटनाओं को मुद्दा बनाया था।

60 दिनो में निर्णय लेने के दिए थे आदेश
याचिका में मांग की गई थी कि भारत निर्वाचन आयोग की “सुविधा” प्रणाली की तर्ज पर पंजाब में भी वैकल्पिक ऑनलाइन नामांकन पोर्टल शुरू किया जाए, ताकि जमीनी लोकतंत्र को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और भयमुक्त बनाया जा सके।
6 फरवरी 2026 को मुख्य न्यायाधीश शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने राज्य चुनाव आयोग को 14 दिसंबर 2025 की प्रतिनिधित्व याचिका पर 60 दिनों के भीतर स्पीकिंग ऑर्डर पारित कर निर्णय लेने और उसे याचिकाकर्ता को सूचित करने का निर्देश दिया था। अब याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि स्पष्ट न्यायिक आदेश के बावजूद आयोग ने समयसीमा के भीतर अपेक्षित कार्रवाई नहीं की, जिससे उन्हें अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।

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