भारत में D2D सैटेलाइट टेक्नोलॉजी पर बड़ा कदम, लेकिन ऐपल-गूगल ने उठाए नियमों और बैटरी खपत पर सवाल

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भारत में D2D सैटेलाइट टेक्नोलॉजी पर बड़ा कदम, लेकिन ऐपल-गूगल ने उठाए नियमों और बैटरी खपत पर सवाल
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भारत डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) सैटेलाइट कनेक्टिविटी लाने पर काम कर रहा है। बता दें कि यह एक ऐसी टेक्नोलॉजी है, जिसके जरिए स्मार्टफोन उन इलाकों में सीधा सैटेलाइट से जुड़ सकेंगे, जहां मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे सरकार इस टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ रही है ऐपल और गूगल ने इस बारे में सरकार से और क्लियरिटी यानी स्पष्टता मांगी है। कंपनियों ने इसके लिए कई चिताएं जताई हैं। कंपनियों के अनुसार, इस तकनीकी के लिए डिवाइस को अधिक बैटरी या पावर की जरूरत होती है। रिपोर्ट की मानें तो कंपनियों का मानना है कि भारत के नियमों के तहत ये सेवाएं कैसे काम करेंगी। आइये, पूरी खबर डिटेल में जानते हैं।

क्या होंगे नियम?
इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, कुछ महीने पहले सैटेलाइट कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी पर चर्चा हुई थी। इस दौरान ऐपल ने दूरसंचार विभाग (DoT) के साथ अपने विचार शेयर किए थे। गूगल और कई अन्य शेयरहोल्डर्स ने भी नियामक को अपनी प्रतिक्रिया दी है। कंपनियां जानना चाहती हैं कि भारत में सैटेलाइट के जरिए मैसेज भेजने और मुसीबत के समय इमरजेंसी कॉल या मैसेज करने वाली तकनीक किस तरह काम करेगी और इसके नियम क्या होंगे।

क्या है D2D?
यह टेक्नोलॉजी भारत में उन जगहों के लिए बहुत उपयोगी है, जहां पहाड़ी राज्यों, घने जंगलों और सीमावर्ती जिलों में मोबाइल कवरेज अभी भी पूरी तरह से उपलब्ध नहीं है। कई दूरदराज के इलाकों में, टेलीकॉम टावर लगाना या तो मुश्किल है या फिर आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं है।

कंपनियों द्वारा उठाई गई तकनीकी सवाल
रिपोर्ट की मानें तो टेक कंपनियों ने कई तकनीकी और इंजीनियरिंग चुनौतियों के बारे में बताया है। इन्हें सैटेलाइट कनेक्टिविटी को आम स्मार्टफोन पर सैटेलाइट कनेक्टिविटी वाले से पहले हल करना अभी भी बाकी है।
सबसे बड़ी चिंताओं में से एक बैटरी का जल्दी खत्म होना है। ट्रेडिशनल मोबाइल नेटवर्क की तुलना में, लो-अर्थ-ऑर्बिट सैटेलाइट से सीधे जुड़ने के लिए काफी ज्यादा बिजली और पावर की जरूरत होती है।
दूसरी परेशानी एंटीना की सीमाएं हैं। स्मार्टफोन को पतला और कॉम्पैक्ट डिजाइन के साथ लाया जाता है। इस कारण इनमें स्थिर सैटेलाइट कम्युनिकेशन बनाए रखने के लिए जरूरी हार्डवेयर फिट करने के लिए जगह कम होती है।

अन्य चिंताएं
इसके अलावा कंपनियों ने देश की कुछ वास्तविक स्थितियां जैसे मुश्किल इलाके और पर्यावरणीय कारकों को भी बाधा बताया है। ऐसे इलाकों में भरोसेमंद कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने में आने वाली कठिनाइयों की ओर भी ध्यान देने को कहा है।
इसके अलावा, मौजूदा 4G और 5G मोबाइल नेटवर्क के साथ सैटेलाइट कम्युनिकेशन को इस तरह से जोड़ना कि यूजर्स के अनुभव पर कोई बुरा असर ना पड़े, अभी भी एक और बड़ी चुनौती बनी हुई है।​

TRAI ने भी मांगी राय
टेलीकम्युनिकेशन विभाग अभी इंडस्ट्री के लोगों के साथ इनफॉर्मल बातचीत कर रहा है, ताकि आधाकारिक नियम बनाने से पहले D2D सैटेलाइट टेक्नोलॉजी की संभावनाओं और सीमाओं को बेहतर ढंग से समझा जा सके। इसके साथ ही, भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने भी एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया है, जिसमें यह राय मांगी गई है कि क्या ऐसी सेवाओं के लिए डेडिकेटेड सैटेलाइट स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किया जाना चाहिए या मौजूदा मोबाइल नेटवर्क एयरवेव्स का। इन चर्चाओं से समझ आ रहा कि जहां एक तरफ भारत सरकार अमेरिका की तरह डॉयरेक्ट टू डिवाइस टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ रही। वहीं, टेक कंपनियों को अभी कई चिताएं हैं।

 

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