कच्चे तेल की ढुलाई 3 डॉलर से बढ़कर 20 डॉलर पार, क्या महंगे होंगे पेट्रोल-डीजल?

Editor
5 Min Read

  नई दिल्ली
   

पश्चिम एशिया से कच्चे तेल की सप्लाई संघर्ष से पहले के स्तर के 90% से ज्यादा पर लौट आई है, लेकिन भारत को इसका फायदा तुरंत मिलता नहीं दिख रहा. वजह है तेल की ढुलाई पर बढ़ता खर्च. कच्चे तेल को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने की लागत एक साल पहले करीब 3 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब 20 डॉलर से ज्यादा हो गई है। 

ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई सुधरने के बावजूद भारतीय रिफाइनरियों की लागत ऊंची बनी हुई है. इसका असर तेल कंपनियों के मुनाफे और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है. इंवेस्टमेंट बैंक जेफरीज (Jefferies) के मुताबिक, कच्चे तेल की ढुलाई का मालभाड़ा संघर्ष से पहले के स्तर से बढ़कर करीब आठ गुना पहुंच गया है. लैंडेड क्रूड कॉस्ट यानी रिफाइनरी तक तेल पहुंचाने की कुल लागत में इसकी हिस्सेदारी 25% से ज्यादा हो गई है, जबकि पहले यह करीब 3% थी। 

इस लागत में कच्चे तेल की कीमत के साथ मालभाड़ा, बीमा और डिलीवरी से जुड़े अन्य खर्च शामिल होते हैं. हालांकि, तेल की खरीद पर कुछ राहत मिली है. जेफरीज के अनुसार, ईरान को छोड़कर पश्चिम एशिया से निर्यात में सुधार के कारण फिजिकल क्रूड प्रीमियम एक सप्ताह में 65% घटकर 9 डॉलर प्रति बैरल रह गया. लेकिन महंगी ढुलाई इस राहत का बड़ा हिस्सा खत्म कर रही है। 

पांच वजहों से महंगा हुआ तेल का परिवहन
गोल्डमैन सैक्स ने ढुलाई लागत बढ़ने के पीछे पांच प्रमुख वजहें बताई हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े युद्ध जोखिम का खर्च सबसे ज्यादा है. इसके अलावा खाड़ी के बाहर जहाजों से जहाजों के बीच तेल ट्रांसफर, महंगा समुद्री ईंधन, टैंकरों की परिचालन संबंधी दिक्कतें और ईरान के बेड़े का सीमित इस्तेमाल भी लागत बढ़ा रहे हैं. सिंगापुर में समुद्री ईंधन की कीमत 428 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 919 डॉलर प्रति टन हो गई है. वहीं, होर्मुज में सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण जहाजों को वैकल्पिक रास्ते अपनाने पड़ रहे हैं, जिससे यात्रा और परिचालन का खर्च बढ़ा है। 

क्या भारत में बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है. इसलिए ढुलाई महंगी होने से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) की लागत बढ़ी है. अगर कंपनियां बढ़े हुए खर्च के अनुपात में पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं बढ़ातीं, तो उनके मार्केटिंग मार्जिन पर दबाव पड़ता है. जेफरीज ने अपने अनुमान में तेल कंपनियों को पेट्रोल पर 28 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 34 रुपये प्रति लीटर का मार्केटिंग नुकसान बताया है. हालांकि, महंगी ढुलाई का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत बढ़ जाएंगी। 

खुदरा कीमतों पर असर इस बात से तय होगा कि तेल कंपनियां बढ़ी हुई लागत खुद उठाती हैं या ग्राहकों तक उसका कुछ हिस्सा पहुंचाती हैं. कच्चे तेल के उत्पादकों की ओर से मिलने वाली छूट और सरकार की नीतियां भी इसमें अहम भूमिका निभाएंगी. अगर मालभाड़ा लंबे समय तक ऊंचा रहता है, तो तेल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बना रह सकता है. वहीं, परिवहन और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों की लागत बढ़ने से महंगाई पर भी असर पड़ सकता है. ईंधन महंगा होने पर माल ढुलाई, उत्पादन और कई अन्य सेवाओं का खर्च बढ़ने की आशंका रहती है। 

ऊर्जा बाजार में प्राकृतिक गैस पर भी दबाव है. जेफरीज के मुताबिक, स्पॉट एलएनजी (LNG) की कीमत एक सप्ताह में 12% बढ़कर 29 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (MMBtu) पहुंच गई. सप्लाई चेन सामान्य होने में लगने वाला समय और सर्दियों की मांग गैस की कीमतों को ऊंचा रख सकती है. भारत के लिए आगे की तस्वीर इस बात पर निर्भर करेगी कि पश्चिम एशिया में समुद्री रास्ते कितनी जल्दी सामान्य होते हैं और मालभाड़ा किस रफ्तार से घटता है. कच्चे तेल की सप्लाई में सुधार के साथ ढुलाई लागत और ऊर्जा की कीमतों में भी राहत मिलना जरूरी है. जब तक ऐसा नहीं होता, भारतीय तेल कंपनियों के मार्जिन और उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत मिलने की संभावनाओं पर दबाव बना रह सकता है। 

TAGGED: ,
Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

YouTube Reporters Support Directors Live