बस्तर दशहरा में निभाई गई निशा जात्रा की परंपरागत रस्म

Editor
2 Min Read

जगदलपुर.

बस्तर दशहरा की विशिष्ट धार्मिक परंपराओं में शामिल निशा जात्रा का विधान महाअष्टमी की आधी रात को संपन्न हुआ. 19 अक्टूबर की रात अनुपमा चौक स्थित निशा जात्रा गुड़ी में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की गई.

इस दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव, दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी और मांझी-चालकी सहित श्रद्धालु मौजूद रहे. परंपरागत वाद्ययंत्रों, दीपों की रोशनी और आतिशबाजी के बीच राजपरिवार के सदस्य मंदिर पहुंचे. विधान के दौरान बस्तर और देश की खुशहाली, शांति और समृद्धि की कामना की गई. परंपरा के अनुसार, भैरव देव की पूजा के बाद मंदिर परिसर में 12 बकरों की बलि दी गई. इसके बाद मावली मंदिर, सिंहद्वार और काली मंदिर में भी पूजा-अर्चना की और निर्धारित धार्मिक विधान निभाए. दंतेश्वरी मंदिर में काले कबूतर और सात मोंगरी मछलियों का भोग अर्पित किया गया, जबकि श्रीराम मंदिर में उड़द दाल का भोग और रखिया कुम्हड़ा की बलि दी गई.

इस विधान के लिए 12 गांवों के राउत ग्रामीण 12 कांवड़ों में 24 मिट्टी के मटकों के साथ पारंपरिक भोग-प्रसाद लेकर पहुंचे थे. सिंगनपुर, राजूर, छिटकागुड़ा, एरंडवाल, मुसलीगुड़ा, उडुवा, नैनपुर, रायकोट, आरापुर, चालकीगुड़ा, चोकर और धर्माउर के राउतों ने भोग-प्रसाद तैयार करने की जिम्मेदारी निभाई. निशा जात्रा के बाद अब बस्तर दशहरा की अगली महत्वपूर्ण रस्म मावली परघाव होगी, जिसमें माता की डोली और छत्र का स्वागत किया जाएगा.

TAGGED:
Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

YouTube Reporters Support Directors Live