रूसी तेल-गैस खरीदने पर भारत समेत 5 देशों को राहत, 100% टैरिफ पर ट्रंप का यू-टर्न

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नई दिल्ली

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत समेत पांच देशों को रूस से तेल और गैस खरीदने पर टैरिफ से छूट देने का ऐलान किया है. यह फैसला 'लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' के तहत लगाया गया था, जिसमें इन देशों को राष्ट्रीय हित के तहत छूट दी गई है. ट्रंप ने स्पष्ट किया कि इन पांच देशों को रूस से ऊर्जा खरीदने पर कोई शुल्क नहीं देना होगा, जिससे उनके आर्थिक और ऊर्जा सहयोग को बढ़ावा मिलेगा। 

चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान इन पांच देशों में शामिल है. अमेरिकी राष्ट्रपति का यह कार्यकारी आदेश ऐसे समय में आया है, जब रूस को लेकर वे नरम रुख अपना रहे हैं. वहीं, सार्वजनिक रूप से वे यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की की आलोचना भी कर रहे हैं। 

ट्रंप ने राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए 'रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने संबंधी अधिनियम' के तहत लगाए गए प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों से छूट देने का फैसला किया है. शुक्रवार शाम जारी एक कार्यकारी आदेश में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'ग्राहम एक्ट' के तहत लगाए जाने वाले प्रतिबंधों, पाबंदियों और टैरिफ से छूट का ऐलान किया है. ट्रंप ने आदेश में कहा कि वह राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए यह फैसला ले रहे हैं। 

ट्रंप ने पिछले महीने रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों पर सख्ती बढ़ाने वाले कानून पर हस्ताक्षर किए थे. इसमें रूस के बड़े तेल खरीदारों से आने वाले सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का प्रावधान था. इसकी समयसीमा 18 अक्टूबर को खत्म होने वाली थी. लेकिन शुक्रवार देर रात जारी कार्यकारी आदेश में ट्रंप ने फिलहाल इन टैरिफ और संबंधित प्रतिबंधों को लागू करने से छूट दे दी. उन्होंने कांग्रेस को बताया कि मौजूदा समय में यह छूट अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है. हालांकि राहत को स्थायी फैसला नहीं माना जा सकता. ट्रंप बाद में परिस्थितियों के अनुसार फिर से टैरिफ लगाने का विकल्प अपने पास रख सकते हैं. यही वजह है कि भारत को राहत तो मिली है लेकिन व्यापारिक अनिश्चितता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। 

ट्रंप ने किस कानून के तहत टैरिफ लगाने की तैयारी की थी?
    इस विवाद की जड़ रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों वाला कानून है जिसे ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ नाम से बताया गया है. इसका मकसद रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने के लिए मिलने वाले आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाना था. कानून में रूसी अधिकारियों, बैंकों और ऊर्जा कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने के साथ उन विदेशी देशों पर भी कार्रवाई का प्रावधान था जो रूस से तेल खरीदते हैं। 

    इसके तहत भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों से आने वाले सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का रास्ता खुलता. इसके अलावा रूस के ऊर्जा उत्पादों के अमेरिकी आयात पर 500 फीसदी तक टैरिफ और रूसी संस्थाओं के खिलाफ प्रतिबंधों का प्रावधान भी बताया गया था. हालांकि कार्यकारी आदेश के बाद ये उपाय फिलहाल लागू नहीं किए जा रहे हैं. इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा कानून रद्द हो गया है। 

आखिर अमेरिका ने आखिरी वक्त पर क्यों लिया यू-टर्न?
    पहली वजह:
अमेरिका में मिड टर्म चुनाव नजदीक हैं. ऐसे समय में ईंधन की कीमतें और महंगाई आम मतदाताओं के लिए अहम मुद्दे बन सकती हैं. यदि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाए जाते तो वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार पर उसका असर पड़ सकता था. इससे कीमतें बढ़ने का जोखिम भी रहता. इसलिए घरेलू आर्थिक दबाव ट्रंप प्रशासन के फैसले को प्रभावित करने वाला एक कारण है। 

    दूसरी वजह: रूस दुनिया के बड़े तेल सही ऊर्जा उत्पादकों में शामिल है. उसके तेल के प्रवाह पर बहुत ज्यादा रोक लगाने से वैश्विक आपूर्ति और कीमतों पर दबाव पड़ सकता है. अमेरिका के लिए भी महंगी ऊर्जा आर्थिक चुनौती बन सकती है. ऐसे में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की योजना को फिलहाल रोकना बाजार में अनिश्चितता कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है. हालांकि ट्रंप के आदेश में अमेरिका द्वारा रूस से तेल खरीदने की इच्छा को वजह नहीं बताया गया है। 

आधिकारिक तौर पर फैसला राष्ट्रीय हित के आधार पर लिया गया है.
    तीसरी वजह: टैरिफ को फिलहाल टालने से अमेरिका के पास आगे की बातचीत और रणनीति के लिए विकल्प खुले रहते हैं. यदि परिस्थितियां बदलती हैं तो ट्रंप प्रशासन इन शुल्कों को फिर लागू करने पर विचार कर सकता है. यानी यह कदम रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव की नीति को पूरी तरह छोड़ने के बजाय उसे कुछ समय के लिए रोकने जैसा है। 

भारत को कितनी बड़ी राहत मिली?
भारत के लिए यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस उसके प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है. यदि भारतीय सामान पर 100 फीसदी टैरिफ लगा दिया जाता तो अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की कीमत बढ़ सकती थी. इससे भारत के निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने और अमेरिकी खरीदारों की मांग घटने का खतरा था। 

भारत और अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों में पिछले साल रूसी तेल की खरीद को लेकर तनाव बढ़ा था. उस समय ट्रंप प्रशासन ने भारत पर सामान्य टैरिफ के अलावा रूसी कच्चे तेल की खरीद से जुड़ा अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ लगाया था. हालांकि फरवरी 2026 में अतिरिक्त शुल्क हटा दिया गया और पारस्परिक टैरिफ को घटाकर 18 फीसदी किया गया. ऐसे में नया 100 फीसदी टैरिफ लागू होना व्यापार संबंधों के लिए एक और बड़ी चुनौती बन सकता था. फिलहाल इस आशंका से राहत मिली है। 

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