सांस्कृतिक धरोहर भावी पीढ़ियों को समृद्ध अतीत से जोड़ने का सशक्त माध्यम : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

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भोपाल 

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि प्रदेश की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहरें भावी पीढ़ियों को समृद्ध अतीत से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। साथ ही हमारे गौरवशाली इतिहास, ज्ञान, कला और सभ्यता की जीवंत प्रतीक हैं।इन धरोहरों का संरक्षण एवं संवर्धन समय की आवश्यकता है, जिससे भावी पीढ़ियाँ भी अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व का अनुभव कर सकें। राज्य सरकार “विरासत भी-विकास भी” के संकल्प को साकार करते हुए सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण के साथ धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को भी बढ़ावा दे रही है।प्रदेश में प्राचीन मंदिरों एवं ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और पुनरुद्धार कार्य निरंतर किया जा रहा है।इन प्रयासों से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित हो रहे हैं और नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर प्राप्त हो रहा है।

प्रदेश अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, प्राचीन स्थापत्य कला और ऐतिहासिक धरोहरों के कारण देश में विशिष्ट पहचान रखता है। संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय द्वारा प्रदेश में बिखरे मंदिर अवशेषों का वैज्ञानिक पद्धति से मूल स्वरूप में पुनर्स्थापन किया जा रहा है। ‘पुनर्संरचना’ एवं ‘एनास्टाइलोसिस’ जैसी तकनीकों के माध्यम से धरोहरों की मौलिकता और ऐतिहासिकता को संरक्षित किया जा रहा है। यह अभियान प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण और पुनर्जीवन का महत्वपूर्ण प्रयास है।

देवबड़ला और आशापुरी बने पुरातात्विक पुनरुद्धार के उत्कृष्ट उदाहरण

सीहोर जिले का देवबड़ला और रायसेन जिले का आशापुरी क्षेत्र पुरातात्विक पुनरुद्धार के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में उभरकर सामने आया है। इन स्थानों की विशेषता यह है कि यहाँ मंदिरों का अस्तित्व लगभग समाप्त हो चुका था, किंतु उत्खनन के दौरान प्राप्त बिखरे अवशेषों एवं खंडित प्रतिमाओं को वैज्ञानिक पद्धति से एकत्रित कर पुनर्स्थापित किया गया है।

देवबड़ला में परमारकालीन मंदिरों का किया जा रहा है पुनर्स्थापन

घने जंगलों के मध्य स्थित सीहोर जिले के देवबड़ला में 11वीं शताब्दी के परमारकालीन मंदिर अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से पुनर्निर्माण कराया गया है। यहाँ ‘भूमिज शैली’ में निर्मित मंदिरों की ‘पंच-रथ’ योजना तत्कालीन उन्नत स्थापत्य कला का नमूना है। मंदिर क्रमांक-1 एवं 2 के पुनर्संरचना कार्य में मूल पत्थरों का उपयोग कर उनकी प्राचीनता को सुरक्षित रखा गया है। द्वार-शाखाओं पर उकेरी गई गंगा-यमुना की प्रतिमाएँ तथा सूक्ष्म नक्काशी इस स्थल को विशेष बनाती हैं।

आशापुरी में किया जा रहा है प्रतिहारकालीन मंदिरों का संरक्षण

रायसेन जिले का आशापुरी क्षेत्र अपने प्राचीन मंदिर समूहों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ 9वीं शताब्दी के प्रतिहारकालीन मंदिर क्रमांक-17 का पुनरुद्धार किया गया है। मंदिर के वर्गाकार गर्भगृह एवं मुखमंडप को अत्यंत सावधानीपूर्वक पुनर्स्थापित किया गया है। स्थल से प्राप्त शिव-नटेश, लक्ष्मी-नारायण तथा गजासुर संहारक शिव की प्रतिमाएँ प्रदेश की समृद्ध मूर्तिकला परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

सम्पूर्ण प्रदेश में हो रहे हैं मंदिर संरक्षण एवं पुनरुद्धार कार्य

प्रदेश में धरोहर संरक्षण एवं पुनरुद्धार के कार्य व्यापक स्तर पर संचालित किए जा रहे हैं। खंडवा जिले के ओंकारेश्वर में सिद्धेश्वर एवं अन्य मंदिर परिसरों का वैज्ञानिक संरक्षण किया जा रहा है। उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर परिसर में प्राचीन धरोहरों को संरक्षित किया गया है। वहीं रायसेन जिले के धवला क्षेत्र में मंदिरों की संरचनात्मक सुरक्षा एवं विशेष सफाई कार्य संपादित किए गए हैं। इन सभी स्थलों पर ‘एनास्टाइलोसिस’ तकनीक के माध्यम से मूल पत्थरों द्वारा पुनर्गठन सुनिश्चित किया जा रहा है, जिससे ऐतिहासिकता एवं मौलिक स्वरूप सुरक्षित बना रहे।

इन समेकित प्रयासों से प्रदेश न केवल अपनी ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण कर रहा है, बल्कि उन्हें नई पहचान भी प्रदान कर रहा है। प्राचीन विरासत को आधुनिक दृष्टिकोण से जोड़ने की यह पहल प्रदेश को सांस्कृतिक पर्यटन के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों तक ले जाने में महत्वपूर्ण सिद्ध हो रही है। गौरवशाली अतीत और आधुनिक तकनीक के समन्वय से संचालित यह अभियान प्रदेश को सांस्कृतिक पर्यटन के वैश्विक मानचित्र पर नई पहचान दिलाने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों और विरासत के संरक्षण का सशक्त संदेश भी दे रहा है।

 

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