पंजाब में दो वसीयतों पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 26 साल पुराना संपत्ति विवाद हुआ खारिज

Editor
4 Min Read

चंडीगढ़
 पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुड़े करीब 26 साल पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मृत्यु से कुछ दिन पहले बनाई गई दोनों वसीयतों को संदिग्ध माना है।

अदालत ने कहा कि जब वसीयतकर्ता गंभीर रूप से बीमार हो और वसीयत बनाने के कुछ ही दिन बाद उसकी मृत्यु हो जाए, तो यह साबित करना जरूरी है कि वह वसीयत के समय स्वस्थ मानसिक स्थिति में था और उसने स्वतंत्र इच्छा से दस्तावेज तैयार किया था।

इस मामले में ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण सामने नहीं आया। जस्टिस परमोद गोयल ने मोहन सिंह की ओर से दायर नियमित दूसरी अपील खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। विवाद सलविंदर सिंह की संपत्ति को लेकर था जोकि अविवाहित और नि:संतान थे।

अदालत ने खारिज किया दावा

उनके भाइयों ने दावा किया कि सलविंदर ने एक अक्टूबर, 1991 को वसीयत बनाकर सभी भाइयों को संपत्ति में बराबर हिस्सा दिया था। वहीं, सलविंदर की देखभाल करने वाले मोहन सिंह ने दावा किया कि सलविंदर सिंह ने 25 सितंबर, 1991 को पूरी संपत्ति उनके नाम वसीयत कर दी थी।

निचली अदालत ने 25 सितंबर की वसीयत को सही मानते हुए भाइयों का दावा खारिज कर दिया था। हालांकि प्रथम अपीलीय अदालत ने दोनों वसीयतों को संदिग्ध मानते हुए कहा कि संपत्ति का उत्तराधिकार वसीयत के बजाय कानून के अनुसार होगा।

एक वसीयत आठ तो दूसरी मृत्यु से महज दो दिन पहले बनी थी

हाई कोर्ट ने पाया कि सलविंदर सिंह की मृत्यु तीन अक्टूबर, 1991 को हुई थी। यानी मोहन सिंह के पक्ष में बताई गई वसीयत उनकी मृत्यु से महज आठ दिन पहले और दूसरे पक्ष की वसीयत मृत्यु से सिर्फ दो दिन पहले तैयार हुई थी। दोनों वसीयतें मूल रूप से अपंजीकृत थीं और 25 सितंबर की वसीयत को उनकी मृत्यु के बाद छह दिसंबर, 1991 को पंजीकृत कराया गया।

अदालत ने कहा कि 25 सितंबर की वसीयत के समय सलविंदर सिंह अस्वस्थ थे और इलाज करा रहे थे। इसके बावजूद वसीयत के लेखक और गवाहों ने यह नहीं बताया कि वह तब स्वस्थ मानसिक स्थिति में थे और दस्तावेज को समझकर अपनी स्वतंत्र इच्छा से बना रहे थे।

अदालत ने इसे गंभीर कमी माना। हाई कोर्ट ने वसीयत की तारीख अलग स्याही से लिखे जाने के साथ ही मृत्यु के बाद वसीयत पंजीकृत कराने का कारण स्पष्ट नहीं होने और गवाहों के स्टांप पेपर पर वसीयत तैयार किए जाने के दावे के विपरीत दस्तावेज का सादे कागज पर होने जैसी परिस्थितियों को भी महत्वपूर्ण माना।

अदालत ने खारिज की दोनों वसीयत

किसी को भी वैध वसीयत स्वीकार नहीं किया जा सकता हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मृतक का मोहन सिंह के साथ रहना और उनके द्वारा देखभाल किया जाना उनके पक्ष में एक सकारात्मक तथ्य जरूर था, लेकिन अकेले यह तथ्य वसीयत पर उठे संदेह को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं था।

अदालत ने दोनों वसीयतों को संदिग्ध परिस्थितियों से घिरा मानते हुए कहा कि इनमें से किसी को भी सलविंदर सिंह की वैध वसीयत स्वीकार नहीं किया जा सकता।

TAGGED:
Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

YouTube Reporters Support Directors Live