जेवर एयरपोर्ट: यूपी के गौरव का अपमान न करिए अखिलेश

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बहुत पहले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर लिखित एक निबंध पढ़ा था- ‘ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से’ जिसका भावपक्ष यह था कि यदि आपमें ईर्ष्या का भाव है तो आपकी दृष्टि भी नकारात्मक ही रहेगी और आप सकारात्मक पक्षों को देख ही नहीं सकेंगे। वर्तमान में कुछ राजनीतिक दलों में ऐसा ही भाव है और वे प्रमाणित विकास कार्यों को लेकर भी टिप्पणियां करने लगे हैं। ताजा उदाहरण समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के उस बयान का है जिसमें उन्होंने जेवर एयरपोर्ट की पार्किंग में कुछ देर के लिए पानी भर जाने पर टिप्पणी की है कि क्या अब वहां नावें चलेंगी। इस बयान को सिर्फ एक तंज के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसमें उत्तर प्रदेश के उस गौरवबोध की अनदेखी भी छिपी हुई है जो जेवर स्थित नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसी बड़ी उपलब्धि के रूप में राज्य के हर नागरिक को हासिल हुई है। वस्तुतः विकास एक दृष्टि है, एक सोच है, एक ऐसा विजन है जो वर्तमान की सीमाओं से आगे देखकर भविष्य की नींव रखता है। जो लोग खुद कभी इस दृष्टि से परिचित नहीं हुए, जिन्होंने सत्ता में रहते हुए भी प्रदेश के लिए कोई दूरदर्शी परियोजना नहीं गढ़ी, उनके लिए योगी सरकार के ऐतिहासिक कार्यों को देखकर बेचैनी होना स्वाभाविक ही है। यह बेचैनी कभी आलोचना का रूप लेती है, कभी राजनीतिक बयानबाज़ी का, लेकिन इसके मूल में एक ही भाव छिपा होता है- ईर्ष्या।
 
अखिलेश ही नहीं उत्तर प्रदेश के सभी विपक्षी दलों सबसे पहले तो जेवर अंतरराष्ट्रीय परियोजना को समझना चाहिए। यह कोई साधारण निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के आर्थिक भविष्य की आधारशिला है। यह हवाई अड्डा आगे चलकर हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार का स्रोत बनेगा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश को वैश्विक व्यापार मानचित्र पर स्थापित करेगा, और आने वाले दशकों में करोड़ों यात्रियों तथा लाखों टन कार्गो को संभालने की क्षमता रखेगा। यह प्रदेश के उन लाखों युवाओं के लिए अवसर की खिड़की है जो अब तक बड़े महानगरों की ओर पलायन करने को मजबूर थे। यह किसानों, छोटे व्यापारियों, लॉजिस्टिक्स क्षेत्र और पर्यटन उद्योग के लिए नए द्वार खोलने वाला प्रोजेक्ट है। इतने बड़े और दूरगामी लाभ वाली परियोजना का मूल्यांकन उसकी दीर्घकालिक क्षमता से होना चाहिए, न कि किसी एक दिन की प्रकृतिजन्य घटना से। इसीलिए अखिलेश यादव के बयान में उन किसानों का अपमान दिखाई देता है, जिन्होंने इसके लिए जमीन दी। उन अभियंताओं, कर्मचारियों के प्रति अनादर का भाव दिखता है, जिन्होंने रात-दिन एक करके इसे खड़ा किया। उन युवाओं का उपहास दिखाई देता है, जो इसमें अपना भविष्य देखते थे।

यहां दृष्टि का भी फर्क दिखाई देता है। एक परिपक्व नेता इस तरह के आधारहीन बयान नहीं दे सकता, जो खुद उसे ही हास्यास्पद बना दें। जो नेता प्रदेश का भविष्य गढ़ना चाहता है, वह हर बड़े निर्माण कार्य में आने वाली अस्थायी चुनौतियों को समझता है, उन्हें प्रशासनिक दक्षता से हल करने पर भरोसा रखता है, और परियोजना की समग्र तस्वीर को नहीं भूलता। लेकिन जिनके पास खुद यह दृष्टि नहीं रही, वे हर छोटी घटना में बड़ा मुद्दा तलाशते हैं, हर अस्थायी असुविधा को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश करते हैं। कम समय में भारी बारिश के कारण कुछ मिनटों के लिए हुए जल-जमाव को लेकर जिस तरह की राजनीति की गई, वह इसी संकीर्ण सोच का उदाहरण है। यह भूलना नहीं चाहिए कि प्रशासन ने तुरंत सक्रियता दिखाते हुए मात्र 30 मिनट में स्थिति को सामान्य किया, जल निकासी सुनिश्चित की, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि एक भी उड़ान इससे प्रभावित नहीं हुई। यात्री सुरक्षित रहे, संचालन सुचारू रहा, और हवाई अड्डे की कार्यक्षमता पर कोई आंच नहीं आई।

अखिलेश को उन सवालों का जवाब जरूर देना चाहिए जो लाखों मन में कौंधते हैं। उन्होंने स्वयं पांच वर्षों तक प्रदेश की बागडोर संभाली लेकिन विकास के नाम पर क्या दिया? क्या एक भी हवाई अड्डा बना सके?  जब खुद का ट्रैक रिकॉर्ड शून्य हो, तो दूसरों की उपलब्धियों पर सवाल उठाने का नैतिक अधिकार भी कमजोर पड़ जाता है। जो सरकार खुद किसी बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को धरातल पर नहीं उतार पाई, वह आज विकास पर सवाल उठाने की स्थिति में कैसे हो सकती है? यह विरोधाभास साफ दिखाई देता है, और जनता भी इसे भली-भांति समझती है।

अखिलेश में सच को स्वीकार करने का नैतिक साहस होना चाहिए। 2017 के पहले जिस प्रदेश में कदम रखने से निवेशक हिचकते थे, आज वहां वैश्विक स्तर की परियोजनाएं आकार ले रही हैं। जेवर एयरपोर्ट इसी बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। यह हवाई अड्डा आने वाले वर्षों में एशिया के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण विमानन केंद्रों में गिना जाएगा, और इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस दृढ़ इच्छाशक्ति को जाता है जिन्होंने इसे सपने को हकीकत में बदल कर दिखा दिया।
 
बड़ी परियोजनाओं के निर्माण के दौरान छोटी-मोटी तकनीकी या प्रशासनिक चुनौतियां स्वाभाविक होती हैं। असली परीक्षा इस बात की होती है कि प्रशासन इन चुनौतियों से कितनी तेजी और दक्षता से निपटता है। जेवर एयरपोर्ट के मामले में प्रशासन ने तत्परता दिखाई, समस्या का समाधान किया, और यात्री सेवाओं में किसी भी तरह का व्यवधान नहीं आने दिया। यह प्रशासनिक क्षमता की मिसाल है, न कि आलोचना का विषय। दुर्भाग्य की बात यह है कि जब प्रदेश आगे बढ़ने की दिशा में ठोस कदम उठा रहा है, तब कुछ राजनीतिक आवाज़ें नकारात्मकता फैलाने में जुटी हैं। यह प्रवृत्ति प्रदेश की जनता की भावनाओं पर कुठाराघात है। जनता को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा जैसे असली मुद्दों पर विमर्श चाहिए न कि मौसम की एक सामान्य घटना पर राजनीतिक तमाशा। जब विपक्ष के पास ठोस विकल्प और नीतियां नहीं होतीं, तब वह ऐसा ही करता है।

स्वस्थ लोकतंत्र में जवाबदेही जरूरी है लेकिन आलोचना और ईर्ष्या में फर्क होना चाहिए। रचनात्मक आलोचना प्रदेश को आगे बढ़ाती है, जबकि द्वेषपूर्ण राजनीति गतिरोध पैदा करती है। जेवर एयरपोर्ट जैसी परियोजनाओं को राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और दीर्घकालिक लाभ की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। जो लोग इस बड़ी तस्वीर को नहीं देख पाते, वे केवल अपनी सीमित सोच का परिचय देते हैं। उत्तर प्रदेश का स्वरूप उभर रहा है, निखर रहा है, तो इसे ईमानदारी से स्वीकार करना होगा। विकास कोई एक दिन का चमत्कार नहीं होता, यह निरंतर प्रयास, दूरदर्शिता और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम होता है। जेवर एयरपोर्ट इसी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

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