ग्वालियर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अल्पसंख्यक संस्थान खुद चुनेंगे प्राचार्य, सीनियरिटी नहीं होगी बाध्यकारी

Editor
2 Min Read

ग्वालियर 

ग्वालियर स्थित मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की युगल पीठ ने अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के अधिकारों को लेकर अहम और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। गुरुवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थानों को अपने प्राचार्य या प्रभारी प्राचार्य के चयन का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है। राज्य सरकार इन संस्थानों पर वरिष्ठता आधारित नियम लागू करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।

सुनवाई के दौरान पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी शिक्षण संस्थान में प्राचार्य की भूमिका केंद्रीय होती है, जो अनुशासन, प्रशासन और शिक्षा की गुणवत्ता को निर्धारित करता है। ऐसे में संस्थान को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह अपनी आवश्यकता और योग्यता के आधार पर नेतृत्व का चयन करे, भले ही वह व्यक्ति वरिष्ठतम न हो।

कोर्ट ने 25 अगस्त 2021 और 8 सितंबर 2021 को जारी उन सरकारी सर्कुलरों को अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू होने के मामले में निरस्त कर दिया, जिनमें वरिष्ठतम शिक्षक को ही प्रभारी बनाने का प्रावधान था। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि एक बार प्रबंधन द्वारा किसी योग्य व्यक्ति का चयन कर लिया जाए, तो उसकी उपयुक्तता पर सरकार या न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

विदिशा से ग्वालियर तक की कानूनी जंग
वरिष्ठ अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी के मुताबिक, यह मामला विदिशा स्थित एसएसएल जैन पीजी कॉलेज से शुरू हुआ। कॉलेज की तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य डॉ. शोभा जैन के सेवानिवृत्त होने के बाद प्रबंधन समिति ने डॉ. एसके उपाध्याय को प्रभारी प्राचार्य नियुक्त किया।

हालांकि, शासन के क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालक ने इस फैसले को निरस्त करते हुए वरिष्ठता के आधार पर डॉ. अर्चना जैन को प्रभार सौंपने का आदेश जारी कर दिया। प्रबंधन ने इसे अपनी स्वायत्तता में हस्तक्षेप मानते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

शुरुआत में सिंगल बेंच ने शासन के पक्ष में फैसला दिया, लेकिन अब ग्वालियर की युगल पीठ ने उस आदेश को पूरी तरह पलटते हुए प्रबंधन के अधिकार को सही ठहराया।

Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

YouTube Reporters Support Directors Live