हरियाणा में महिला स्वयं सहायता समूहों से गांवों की बदल रही तकदीर

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हरियाणा में महिला स्वयं सहायता समूहों से गांवों की बदल रही तकदीर
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भिवानी
 हरियाणा के गांवों में अब कहावत बदलती नजर आ रही है जिस गांव म्हैं बहु बेटी कमाऊ हो ली, समझो उस गांव की तकदीर चमक ली…। मामूली बचत से शुरू हुई यह मुहिम अब आत्मनिर्भर हरियाणा की सबसे मजबूत पहचान बनती जा रही है।

जी हां कभी चौके-चूल्हे और घर-आंगन तक सीमित मानी जाने वाली ग्रामीण महिलाएं आज हरियाणा के विकास की ऐसी कहानी लिख रही हैं, जिस पर पूरा गांव गुमान कर रहा है। बचत की छोटी-सी पोटली तै शुरू हुआ सफर अब लाखों के कारोबार तक पहुंच गया है

स्वयं सहायता समूहों और लखपति दीदी अभियान ने गांव की बहु बेटियां म्हैं ऐसा भरोसा जगाया है कि अब वे केवल अपने परिवार की आमदनी बढ़ाने तक ही सीमित नहीं, बल्कि पूरे गांव की तरक्की की मजबूत धुरी बन चुकी हैं।

कहीं अचार-पापड़ की खुशबू है तो कहीं देशी अनाज के बिस्कुट, कहीं ड्रोन उड़ाती दीदी है तो कहीं जैविक उत्पादों से दूसरे राज्यों तक पहचान बना रही महिलाएं। गांव की चौपालों में अब खेती-किसानी के साथ कारोबार की बातें भी सुनाई देने लगी हैं। साफ है, हरियाणा के गांवों में बदलाव की बयार चल पड़ी है और इस बदलाव की अगुवाई महिलाएं कर रही हैं।

बचत तै बरकत… यही बन गया गांव का नया मंत्र
हरियाणा में आज 63 हजार से ज्यादा महिला स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं, जिनसे करीब 6.21 लाख परिवार जुड़े हुए हैं। प्रदेश में 5300 ग्राम संगठन और 270 क्लस्टर लेवल फेडरेशन महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की कड़ी बने हुए हैं। कभी हर महीने 100-200 रुपये की बचत करने वाली महिलाएं आज उसी बचत के दम पर बैंक से ऋण लेकर अपना कारोबार खड़ा कर रही हैं।

डेयरी, हस्तशिल्प, अचार, पापड़, मसाले, देशी खाद्य उत्पाद, सिलाई-कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर, अगरबत्ती, जैविक खेती और कई छोटे उद्योग अब गांव की महिलाओं की पहचान बन चुके हैं। पहले जो महिलाएं घर की चौखट लांघने में झिझकती थीं, आज वे अपने उत्पादों की मार्केटिंग कर रही हैं, ऑनलाइन आर्डर ले रही हैं और दूसरे राज्यों तक सामान भेज रही हैं। गांव की चौपाल में अब केवल फसलों की नहीं, बल्कि कारोबार बढ़ाने की भी चर्चा होती है

लखपति दीदी बनण की होड़, बढ़ रहया आत्मविश्वास
स्वयं सहायता समूहों की इस मुहिम को लखपति दीदी अभियान ने नई रफ्तार दी है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार हरियाणा में 58 हजार से ज्यादा महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं। यानी वे सालाना एक लाख रुपये या उससे अधिक की आय अर्जित कर रही हैं।

कमाई बढ़ने के साथ महिलाओं का आत्मविश्वास भी बढ़ा है। अब वे केवल घर के खर्च तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई, परिवार के स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता और पंचायतों के फैसलों में भी अपनी मजबूत भागीदारी निभा रही हैं। गांव की दूसरी महिलाएं भी इन्हें देखकर आगे बढ़ने का हौसला जुटा रही हैं।

हरियाणवी जायके का स्वाद देशभर में पहुंच रहा
गांव की दीदियों का हुनर अब हरियाणा की सरहदों से बाहर भी अपनी पहचान बना चुका है। बहल की रेखा के बनाए देशी अचार, पापड़ और मिर्च-मसाले नोएडा, चंडीगढ़ समेत कई राज्यों में पसंद किए जा रहे हैं। गुरुग्राम के चंदू गांव की पूजा शर्मा देशी अनाज से तैयार बिस्कुट दिल्ली, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश तक भेज रही हैं।

ताजनगर की रवि प्रजापति जैविक उत्पाद तैयार कर रही हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग है। ढिगावा निवासी सुषमा देवी के मिर्च-मसाले, रोस्टेड अनाज, बेसन, पापड़, देशी घी और दूध ग्राहकों की पहली पसंद बन चुके हैं। मंढाणा की शकुंतला आधुनिक तकनीक अपनाकर ड्रोन दीदी के रूप में किसानों की मदद कर रही हैं।

साहलेवाला की विद्या के पायदान, कृष्णा के तैयार किए हरियाणवी परिधान, नीलम का ब्यूटी पार्लर और प्रमिला की देशी गुड़ की सुहाली व साबुन भी बाजार में खूब पसंद किए जा रहे हैं। भिवानी बस अड्डे पर बनाई कैंटीन की थाली का जायका ही न्यारा है।

गांव खरक की सुमन के अचार और सुनीता की तैयार की गई चूड़ियों की भी अच्छी मांग है। ये केवल कुछ उदाहरण हैं। प्रदेश में ऐसी हजारों महिलाएं हैं जो कभी बेरोजगार थीं, लेकिन स्वयं सहायता समूहों से जुड़ने के बाद आज अपने परिवार के साथ-साथ गांव की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती दे रही हैं। अब गांव में अक्सर यह बात सुनने को मिल जाती है हमारी बहु बेटियां ईब किसे तै कम कोन्या।

अब बाजार भी साथ, सरकार भी साथ
महिलाओं के उत्पाद केवल गांव तक सीमित न रहें, इसके लिए सरकार भी लगातार प्रयास कर रही है। प्रदेश में 13 सांझा बाजार संचालित किए जा रहे हैं, जहां स्वयं सहायता समूहों के उत्पादों की बिक्री होती है। इसके अलावा 420 मिशन कैंटीन और 18 बस अड्डों पर 20 दुकानें महिलाओं के लिए स्थायी बाजार उपलब्ध करा रही हैं।

डिजिटल प्लेटफार्म, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, प्रशिक्षण और बैंकिंग सुविधाओं ने भी महिलाओं के कारोबार को नई पहचान दी है। अब गांव की बहु बेटियां मोबाइल पर आर्डर ले रही हैं और अपने उत्पादों को दूर-दराज के बाजारों तक पहुंचा रही हैं।

नंबर गेम
प्रदेश में महिला ग्राम संगठन : 5300
महिला स्वयं सहायता समूह : 63,000
समूहों से जुड़े परिवार : 6.21 लाख
क्लस्टर लेवल फेडरेशन : 270
सांझा बाजार : 13
मिशन कैंटीन : 420
18 बस अड्डों पर संचालित दुकानें : 20

लखपति दीदी : 58,000 से अधिक
मुख्य कार्यकारी अधिकारी सूरजभान ने कहा कि स्वयं सहायता समूहों को बेहतर बाजार, डिजिटल प्लेटफार्म और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। आने वाले वर्षों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत महिलाएं ही होंगी। जब महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होती हैं तो केवल एक परिवार नहीं, बल्कि पूरा गांव विकास की राह पर आगे बढ़ता है।

 

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