फीफा वर्ल्ड कप 2026 में बालोगुन का रेड कार्ड विवाद, बैन हटाने पर उठे सवाल

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 नई दिल्ली
फीफा वर्ल्ड कप 2026 में अमेरिका के फुटबॉलर फोलारिन बालोगुन विवादों में घिर गए हैं। इसमें संयुक्त राज्या अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का नाम भी चर्चा में है। दावा किया जा रहा है कि ट्रंप के फोन कॉल की वजह से बालोगुन पर लगे बैन को फीफा ने हटा दिया। दरअसल, अमेरिका का सामना राउंड ऑफ-32 में बोस्निया हर्जेगोविना से था।

मैच में बालोगुन ने एक शानदार गोल किया। हालांकि, इस दौरान उनका पैर बोस्निया के डिफेंडर तारिक मुहरेमोविच के पैर से लग गया था। इसके बाद मैच रेफरी राफेल क्लॉस ने सामान्य फाउल मानने से इनकार कर दिया। वीएआर में स्लो मोशन में देखने के बाद रेफरी ने बालोगुन को रेड कार्ड दिखा दिया और उन्हें मैदान से बाहर जाना पड़ा।

फीफा ने रेड कार्ड को बताया था सही
फीफा ने दो दिनों बाद साफ कर दिया कि रेड कार्ड सही है। इसके बाद बालोगुन पर अगले मैच के लिए बैन कर दिया गया। इससे उनका बेल्जियम के खिलाफ मुकाबले से बाहर होना तय माना जा रहा था। हालांकि, रविवार को अचानक फीफा ने अपना फैसला बदल दिया और बालोगुन को बेल्जियम के खिलाफ होने वाले मुकाबले के लिए हरी झंडी दे दी गई। फीफा ने लेकिन रेड कार्ड को पूरी तरह से खत्म नहीं किया। अगर वे आने वाले मैच में इस तरह का फाउल करेंगे, तो बैन को तुरंत लागू कर दिया जाएगा।

फीफा ने अचानक कैसे बदल दिया नियम?
फीफा के अचानकर फैसला बदलने की वजह से सोशल मीडिया पर इसकी जमकर आलोचना हो रही है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि फीफा ने किस नियम के तहत बैन को हटाया है। दरअसल, फीफा ने आर्टिकल 27 का इस्तेमाल कर बालोगुन के बैन को हटाया है। ये आर्टिकल फीफा को अधिकार देता है कि वो किसी खिलाड़ी के बैन को पूरी तरह से खत्म कर सकता है या फिर आंशिक रूप से खत्म कर दे। बालोगुन के लिए इसी नियम का इस्तेमाल किया गया और अगर वे अगले एक सालों कोई इस तरह का फाउल करते हैं, तो उनके ऊपर दोबारा से ये प्रतिबंध लागू कर दिए जाएंगे।

डोनल्ड ट्रंप की कैसे हुई एंट्री?
प्रतिबंध हटने के बाद ब्रिटिश अखबार द गार्जियन की एक रिपोर्ट सामने आई। इसमें दावा किया गया कि बालोगुन पर बैन लगने के बाद बुधवार से लेकर रविवार के बीच ट्रंप ने फीफा के अधिकारियों को तीन बार फोन किया। हालांकि, इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। बैन हटने के बाद ट्रंप ने फीफा के इस कदम को सही बताया और इसका स्वागत किया। इसके बाद सोशल मीडिया पर चर्चा होने लगी कि फीफा ने अमेरिकी राष्ट्रपति के दबाव में आकर ऐसा फैसला किया है।

 

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