इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, किन्नरों को ‘बधाई’ वसूली का कानूनी अधिकार नहीं

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प्रयागराज

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडरों (किन्नरों) के पारंपरिक बधाई उपहारों को लेकर दिए एक अहम आदेश में कहा है कि उनके पास ऐसे उपहार या पारंपरिक भेंट (नजराना) लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। रेखा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के केस में 15 अप्रैल को दिए इस महत्वपूर्ण फैसले में, न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने किन्नर रेखा देवी द्वारा अन्य किन्नरों द्वारा कथित रूप से अपने ‘क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र’ के अतिक्रमण के खिलाफ सुरक्षा की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस केस में याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि इस प्रकार की वसूली कई सालों से हो रही थी। इसे प्रथागत अधिकार का दर्जा प्राप्त था। हालांकि मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि इस तरह की भेंट लेने का कोई कानूनी आधार नहीं है। न्यायाधीश ने कहा, ‘कानून के अनुसार ही किसी व्यक्ति से धन, कर, शुल्क या उपकर वसूले जा सकते हैं। इस तरह की अनुमति देने वाला कोई वैध या कानूनी आधार नहीं है।’ कोर्ट ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता द्वारा मांगे गए ऐसे अधिकार कानून द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायालय अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए, कानून के समर्थन के बिना याचिकाकर्ता के कृत्यों को वैध नहीं ठहरा सकता।’

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसले देते हुए यह भी कहा कि किसी नागरिक को केवल उतनी ही कर, उपकर या शुल्क का भुगतान करने का निर्देश दिया जा सकता है, जिसे कानून के अनुसार उससे वैध रूप से वसूला जा सकता है। कोर्ट ने याचिका में की गई प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया और कहा कि इस प्रकार धन की वसूली को किसी भी तरह से वैध नहीं ठहराया जा सकता।

अवैध वसूली है अपराध
हाई कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता के प्रति किसी प्रकार की नरमी बरती जाती है, तो संभव है कि कई अन्य व्यक्ति या गिरोह सक्रिय हों और व्यक्तियों से जबरन अवैध वसूली कर रहे हों। इस प्रकार की अवैध वसूली को देश में कानून द्वारा कभी भी मान्यता नहीं दी गई है। यह भारतीय न्याय संहिता के तहत एक अपराध है।

एक-दूसरे के क्षेत्र के अतिक्रमण की हुई थी शिकायत
इस मामले में अधिवक्ता संगीता वर्मा ने कोर्ट में याचिकाकर्ता का पक्ष रखा। कोर्ट को यह बताया गया था कि याचिकाकर्ता गोंडा जिले के किन्नर समुदाय से संबंध रखता है। वह लंबे समय से एक विशेष क्षेत्र में बकाया वसूलने के अपने पारंपरिक अधिकार का प्रयोग करता आ रहा है। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में बताया कि गोंडा जिले में इसी तरह के किन्नर समुदाय के कुछ और लोग भी रहते हैं जो बधाई का काम करते हैं। वे एक-दूसरे के क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण कर रहे हैं, जिसके चलते समुदाय के सदस्यों के बीच शत्रुता और हिंसा पैदा हो रही है।

हिंसा के भय से मांगी थी सुरक्षा
इस मामले में याचिकाकर्ता ने हिंसा के भय के बिना बधाई का काम जारी रखने को अपना मौलिक अधिकारों बताते हुए उसकी रक्षा के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत संरक्षण का दावा किया था। याचिका में बधाई के लिए क्षेत्रों के सीमांकन का निर्देश देने की भी मांग की गई थी।

नहीं किया जा सकता इस प्रथा का संरक्षण
इस याचिका पर सुनवाई के बाद दिए फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि चूंकि बधाई वसूलने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, इसलिए इस प्रथा का संरक्षण नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने ट्रांसजेंडर संरक्षण कानून में हाल ही में हुए परिवर्तनों पर भी ध्यान दिया। कोर्ट ने कहा- ‘हमने पाया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 के प्रावधानों के अनुसार भी ऐसे किसी अधिकार के संरक्षण की मांग नहीं की गई है, हालांकि उक्त अधिनियम में ट्रांसजेंडर व्यक्ति को अपना लिंग निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है। भारत की संसद में 2026 का एक नया विधेयक विचाराधीन है, जो किसी व्यक्ति के लिंग निर्धारण के संबंध में 2019 के अधिनियम से काफी भिन्न है।’

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