कहां गायब हो गया मॉनसून? सैटेलाइट तस्वीरों में बादल नदारद, देश में 64% बारिश की कमी से बढ़ी चिंता

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कहां गायब हो गया मॉनसून? सैटेलाइट तस्वीरों में बादल नदारद, देश में 64% बारिश की कमी से बढ़ी चिंता
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 नई दिल्ली
जून का महीना आधा बीत चुका है, लेकिन भारत की जीवनरेखा कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मॉनसून को लेकर एक बेहद हैरान और डराने वाली तस्वीर सामने आई है. सैटेलाइट इमेज और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के हालिया आंकड़ों से पता चला है कि देश के बड़े हिस्से में मॉनसून अचानक बेहद कमजोर हो गया है. अंतरिक्ष से ली गई तस्वीरों में मॉनसून का बादलों वाला पारंपरिक रूप पूरी तरह गायब नजर आ रहा है। 

हालात इतने गंभीर हैं कि जून के शुरुआती दो हफ्तों में ही देश भर में बारिश का आंकड़ा सामान्य से काफी नीचे गिर गया है, जिससे खरीफ फसलों की बुआई और पानी की उपलब्धता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्र में नमी की कोई कमी नहीं है, लेकिन हवा के एक अजीब बर्ताव ने मॉनसून की रफ्तार को पूरी तरह ब्रेक लगा दिया है। 

सैटेलाइट तस्वीरों में गायब दिखे बादल 
मौसम विभाग (IMD) द्वारा 4 जून से 15 जून के बीच जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में देश भर में केवल 19.2 मिमी बारिश दर्ज की गई है, जबकि सामान्य तौर पर इस दौरान 53.7 मिमी बारिश होनी चाहिए थी. इसका सीधा मतलब यह है कि देश इस समय 64% के भारी घाटे का सामना कर रहा है। 

आईएमडी के रेनफॉल डिपार्चर मैप में मध्य, दक्षिणी और पूर्वी भारत के विशाल हिस्से पीले और लाल रंगों में रंगे हुए हैं, जो सूखे जैसे गंभीर हालात को दर्शाते हैं. इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात 15 जून को भारत के INSAT-3DS सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें हैं. आमतौर पर इस मौसम में भारत का जो नक्शा बादलों की घनी सफेद चादर से ढका रहता था, वह इस बार प्रायद्वीपीय और मध्य भारत में बिल्कुल साफ और सूखा दिखाई दे रहा है। 

आखिर साल 2026 में क्यों हांफ रहा है भारतीय मॉनसून?
मौसम वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मॉनसून ने कुछ ही दिन पहले कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सही समय पर दस्तक दे दी थी, तो अचानक यह गायब कैसे हो गया? विशेषज्ञों का कहना है कि यह समस्या समुद्र के तापमान या पानी की कमी के कारण नहीं है, बल्कि यह धरती से कई किलोमीटर ऊपर वायुमंडल में चल रही हवाओं की आपसी जंग का नतीजा है। 

इस समय आसमान की ऊपरी सतह पर बहने वाली 'वेस्टरली जेट स्ट्रीम' (पश्चिमी हवाओं का प्रवाह) अपनी सामान्य जगह से बहुत ज्यादा दक्षिण की ओर खिसक आई है. यह असामान्य बदलाव मॉनसून के सबसे मुख्य इंजन यानी 'ईस्टरली जेट' (पूर्वी हवाओं) के रास्ते में रुकावट बन गया है। 

हवाओं की ऊपरी जंग ने रोका बादलों का बनना
सामान्य परिस्थितियों में, ऊपरी वायुमंडल में बहने वाली ईस्टरली जेट स्ट्रीम भारत के ऊपर हवा को ऊपर की ओर खींचती है, जिससे घने बादल बनते हैं और पूरे उपमहाद्वीप में झमाझम बारिश होती है. लेकिन इस बार शक्तिशाली पश्चिमी हवाएं इस पूरी प्रक्रिया को दबा रही हैं. नतीजा यह हो रहा है कि अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में भरपूर नमी और पानी वाले बादल मौजूद होने के बावजूद, वे भारत की मुख्य भूमि पर बरस नहीं पा रहे हैं। 

हवा का यह ऊपरी दबाव बादलों को बनने और टिकने ही नहीं दे रहा है. यही वजह है कि मॉनसून कागजों और नक्शों पर तो आगे बढ़ गया है, लेकिन जमीन पर बूंद-बूंद बारिश के लिए लोग तरस रहे हैं. मौसम वैज्ञानिक इसे मॉनसून का पूरी तरह खत्म होना नहीं, बल्कि ऊपरी वायुमंडलीय गतिकी के कारण आया एक बड़ा 'मॉनसून पॉज' (मॉनसून का ठहरना) मान रहे हैं। 

क्या आने वाले दिनों में सुधरेंगे हालात?
इस भीषण गर्मी और सूखे के बीच राहत की एकमात्र बात यह है कि मौसम के पूर्वानुमान मॉडल संकेत दे रहे हैं कि यह संकट स्थाई नहीं है. मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस सप्ताह के अंत तक पश्चिमी जेट स्ट्रीम का यह अजीबोगरीब पैटर्न धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगेगा. जैसे ही यह पश्चिमी बाधा हटेगी, मॉनसून फिर एक्टिव होगा। 

उम्मीद जताई जा रही है कि जून के आखिरी हफ्तों में हवाओं का रुख बदलेगा और मध्य तथा दक्षिण भारत के उन हिस्सों में व्यापक बारिश का दौर फिर से शुरू होगा, जो आमतौर पर इस सीजन की पहचान होते हैं. तब तक पूरे देश को मॉनसून की इस दूसरी पारी का इंतजार करना होगा। 

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