जस्टिस स्वर्णकांता का मनीष सिसोदिया ने किया बहिष्कार, केजरीवाल की तरह खत लिख बोले- ‘मैं भी नहीं आऊंगा’

Editor
5 Min Read
जस्टिस स्वर्णकांता का मनीष सिसोदिया ने किया बहिष्कार, केजरीवाल की तरह खत लिख बोले- ‘मैं भी नहीं आऊंगा’
WhatsApp Share on WhatsApp
add_action('wp_footer', 'jazzbaat_new_version_modal'); function jazzbaat_new_version_modal() { ?>
SW24news • Beta

नई दिल्ली

आम आदमी पार्टी के सीनियर नेता मनीष सिसोदिया भी अरविंद केजरीवाल की राह पर चल पड़े हैं. दिल्ली हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता का अब मनीष सिसोदिया ने भी बहिष्कार कर दिया है. मनीष सिसोदिया ने मंगलवार को जस्टिस स्वर्णकांता को चिट्ठी लिखकर कहा है कि अब वह उनकी अदालत में पेश नहीं होंगे. न ही उनकी तरफ से कोई वकील पेश होगा. इससे पहले अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को जस्टिस स्वर्णकांता को चिट्ठी लिख बताया था कि वह अब कभी उनकी अदालत में पेश नहीं होंगे। 

मनीष सिसोदिया ने मंगलवार को जस्टिस स्वर्णकांता को चिट्ठी लिखी और उसमें कहा, ‘मेरी तरफ से भी कोई वकील पेश नहीं होगा. आपके बच्चों का भविष्य तुषार मेहता जी के हाथों में है. मुझे न्याय की उम्मीद नहीं है. अब मेरे पास सत्याग्रह के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है.’ यहां ध्यान देने वाली बात है कि अरविंद केजरीवाल ने भी अपनी चिट्ठी में कहा था कि उन्हें अब न्याय की उम्मीद नहीं दिख रही है. उन्होंने कहा कि उन्हें अब जस्टिस स्वर्णकांता से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं रही, इसलिए वे न तो खुद अदालत में पेश होंगे और न ही अपने वकील को भेजेंगे। 

अरविंद केजरीवाल ने अपने पत्र में क्या कहा था?
अपने पत्र में अरविंद केजरीवाल ने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह निर्णय अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर लिया है. उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह का हवाला देते हुए कहा कि अब वे कानूनी लड़ाई के बजाय नैतिक और वैचारिक विरोध का रास्ता अपनाएंगे. अरविंद केजरीवाल ने यह भी संकेत दिया कि उनका यह कदम न्याय व्यवस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों के समर्थन में है. हालांकि, उन्होंने साफ किया कि यदि जस्टिस स्वर्णकांता कोई फैसला सुनाती हैं, तो उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार वे अपने पास सुरक्षित रखेंगे। 

जस्टिस स्वर्णकांता की अदालत में क्या हुआ था
गौरतलब है कि इससे पहले 20 अप्रैल को दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने दिल्ली आबकारी नीति मामले की सुनवाई से न्यायमूर्ति को खुद को अलग करने की मांग की थी. अपना निर्णय सुनाते हुए जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि याचिका पर विचार किए बिना सुनवाई से पीछे हट जाना एक आसान विकल्प होता, किंतु उन्होंने संस्थागत शुचिता और गरिमा को सर्वोपरि रखते हुए मामले के गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेना उचित समझा। 

जस्टिस स्वर्णकांता ने क्या कहा था?
जस्टिस स्वर्णकांता ने उल्लेख किया कि जब उन्होंने अपना फैसला पढ़ना शुरू किया, तो न्यायालय कक्ष में पूर्ण निस्तब्धता (सन्नाटा) छा गई थी. न्यायमूर्ति ने आगे कहा कि उनके समक्ष यह केवल एक कानूनी प्रश्न नहीं था, बल्कि एक ऐसी चुनौती थी जिसने न्यायाधीश और न्यायिक संस्था, दोनों को ‘परीक्षण’ की कसौटी पर खड़ा कर दिया था. दिल्ली हाईकोर्ट ने इस बात को दोहराते हुए कहा था कि जब तक ठोस सबूतों से खंडन न हो जाए, न्यायाधीश की निष्पक्षता को मान लिया जाता है और किसी वादी की महज आशंका या व्यक्तिगत धारणा के आधार पर न्यायाधीश को मामले से अलग नहीं किया जा सकता है। 

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि किसी वादी को ऐसी स्थिति उत्पन्न करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिससे न्यायिक प्रक्रिया का स्तर गिरे. झूठ, चाहे अदालत में या सोशल मीडिया पर, हजार बार दोहराया जाए, सच नहीं बनता. अरविं केजरीवाल द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि पक्षपात के दावों को साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है, जिनमें अधिवक्ता परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी या उनके परिवार के सदस्यों की पेशेवर व्यस्तता से संबंधित आरोप भी शामिल हैं। 

 

Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *