Yamunanagar के जलाशयों पर अतिक्रमण का कब्जा, 592 तालाबों में कचरा, 69 पूरी तरह सूखे

Editor
5 Min Read
Yamunanagar के जलाशयों पर अतिक्रमण का कब्जा, 592 तालाबों में कचरा, 69 पूरी तरह सूखे
WhatsApp Share on WhatsApp
add_action('wp_footer', 'jazzbaat_new_version_modal'); function jazzbaat_new_version_modal() { ?>
SW24news • Beta

यमुना नगर. जिले में तालाबों और जोहड़ों की बिगड़ती हालत का असर अब भूजल पर साफ दिखाई देने लगा है। जिले के 805 तालाबों में से 592 प्रदूषित हैं, करीब 500 अतिक्रमण की चपेट में हैं। 69 पूरी तरह सूख चुके हैं और 20 से ज्यादा तालाब गायब हो गए। कब्जा कर निर्माण कर लिया गया। इसके कारण वर्षा जल का प्राकृतिक संचयन प्रभावित हो रहा है और सातों ब्लाकों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रादौर, जगाधरी, सरस्वतीनगर और साढौरा ब्लाक को अटल भूजल योजना में शामिल किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार जिले के कई क्षेत्रों में हर वर्ष भूजल स्तर एक से डेढ़ फीट तक गिर रहा है। तालाब और जोहड़ ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण की सबसे पुरानी और प्रभावी व्यवस्था माने जाते रहे हैं। बरसात का पानी इनमें एकत्र होकर धीरे-धीरे जमीन में समाता था, जिससे भूजल रिचार्ज होता था। लेकिन अब बड़ी संख्या में तालाब अतिक्रमण, गंदगी, सीवरेज और गाद की समस्या से जूझ रहे हैं। कई तालाबों की जलधारण क्षमता भी काफी घट चुकी है।

जिले में करीब 500 तालाब अतिक्रमण की चपेट में
जिले में करीब 500 तालाब अतिक्रमण की चपेट में बताए गए हैं। इनमें से 256 तालाब गंभीर रूप से अतिक्रमित श्रेणी में हैं। वहीं 592 तालाब प्रदूषित पाए गए हैं। कई स्थानों पर सीवरेज का पानी तालाबों में पहुंच रहा है, जबकि 69 तालाब पूरी तरह सूख चुके हैं। इससे वर्षा का बड़ा हिस्सा बिना रुके नालों और ड्रेनों के जरिए बाहर निकल जाता है। जल संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहे गोविंद भाटिया का कहना है कि तालाब केवल जलाशय नहीं, बल्कि भूजल रिचार्ज का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। जब तालाबों में पानी रुकना कम हो जाता है तो उसका सीधा असर भूजल स्तर पर पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पहले जोहड़ सालभर पानी का स्रोत बने रहते थे, लेकिन अब उनकी स्थिति तेजी से बदल रही है।

जगाधरी, रादौर, सरस्वतीनगर, व्यासपुर, छछरौली, साढौरा और प्रतापनगर ब्लाकों के ग्रामीण भी जल संकट को महसूस कर रहे हैं। ग्रामीण मोहन वर्मा, प्रवीण कुमार व कुशल पाल सिंह का कहना है कि पहले वर्षा का पानी तालाबों और जोहड़ों में जमा होता था, जिससे आसपास के क्षेत्रों में नमी बनी रहती थी। अब पानी तेजी से बह जाता है और गर्मी के दिनों में जल संकट बढ़ जाता है। इसका असर पशुपालकों पर भी पड़ रहा है। जिन तालाबों से कभी पशुओं को पानी मिलता था, वहां अब या तो पानी नहीं है या उसकी गुणवत्ता खराब हो चुकी है। तालाबों के पुनरुद्धार के लिए अमृत सरोवर योजना के तहत जिले में 42.16 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद 20 परियोजनाएं लंबित हैं। नगर निगम क्षेत्र में 45 तालाबों पर कार्य प्रस्तावित था, लेकिन अब तक दो परियोजनाएं ही पूरी हो सकी हैं।

चार ब्लाकों पर विशेष फोकस
भूजल स्तर में लगातार गिरावट को देखते हुए अटल भूजल योजना के तहत रादौर, जगाधरी, सरस्वतीनगर और साढौरा ब्लाक चिन्हित किए गए हैं। इन चारों ब्लाकों की 251 ग्राम पंचायतों में जल संरक्षण गतिविधियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इन क्षेत्रों का चयन इसलिए किया गया क्योंकि यहां भूजल का दोहन अधिक और संरक्षण अपेक्षाकृत कम है।

संरक्षण और वर्षा जल संचयन पर गंभीरता से हो काम
भूजल विभाग के आंकड़े बताते हैं कि जिले में पानी लगातार गहराई में जा रहा है। जगाधरी, रादौर, सरस्वतीनगर और बिलासपुर खंडों में वर्ष 2014 से 2018 के बीच भूजल स्तर में लगातार गिरावट दर्ज की गई। इसके बाद भी पानी और नीचे खिसका है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018 के बाद इन क्षेत्रों में भूजल स्तर एक से सवा मीटर तक और नीचे चला गया है। वर्तमान में व्यासपुर खंड की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है।

यहां भूजल 25 मीटर की गहराई पर पहुंच चुका है। रादौर में पानी 18 मीटर, सरस्वतीनगर और प्रतापनगर में 15-15 मीटर, जगाधरी में करीब 14.5 मीटर, साढौरा में 11 मीटर और छछरौली में नौ मीटर गहराई पर उपलब्ध है। वैज्ञानिक डाक्टर राजेश गडिया का कहना है कि जिले में हर साल औसतन एक से डेढ़ फीट तक भूजल स्तर नीचे जा रहा है। यदि जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन पर गंभीरता से काम नहीं किया गया तो आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *