चंडीगढ़.
सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल होकर 100 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता का शिकार हुए एक कारोबारी के परिवार को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाई कोर्ट ने करीब 22 वर्ष पुराने मामले में मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण जींद (एमएसीटी) द्वारा दिए गए मुआवजे को बढ़ाते हुए कुल 87.66 लाख रुपये कर दिया।
पहले ट्रिब्यूनल ने 24.86 लाख रुपये मुआवजा दिया था। अब अदालत ने 62.80 लाख रुपये अतिरिक्त मुआवजा नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित देने का आदेश दिया है। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने श्याम सुंदर गुप्ता के कानूनी वारिसों की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि दुर्घटना ने पीड़ित की न केवल शारीरिक क्षमता छीन ली, बल्कि उसकी आजीविका और सामान्य जीवन जीने की संभावनाएं भी समाप्त कर दी थीं। ऐसे मामलों में पीड़ित और उसके परिवार को न्यायोचित एवं पर्याप्त मुआवजा मिलना चाहिए। रिकार्ड के अनुसार 26 नवंबर 2003 को हुए सड़क हादसे में श्याम सुंदर गुप्ता गंभीर रूप से घायल हो गए थे। दुर्घटना में उनकी रीढ़ की हड्डी, कूल्हे, पैर और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटें आईं। चिकित्सकीय जांच में उन्हें 100 प्रतिशत स्थायी दिव्यांग घोषित किया गया।
वह अपने दैनिक कार्य स्वयं करने में असमर्थ हो गए थे और जीवन भर दूसरों पर निर्भर रहने को मजबूर हो गए। दुर्घटना के बाद उन्हें देश के विभिन्न अस्पतालों में लंबे समय तक इलाज कराना पड़ा। लगभग 12 वर्ष तक बिस्तर पर रहने के बाद 26 मार्च 2015 को उनका निधन हो गया। हाई कोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने मुआवजा तय करते समय कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया था। अदालत ने आयकर रिटर्न के आधार पर उनकी मासिक आय 10,855 रुपये मानी और भविष्य की आय की संभावनाओं को भी जोड़ा। इसके बाद 100 प्रतिशत कार्यात्मक दिव्यांगता को ध्यान में रखते हुए आय के नुकसान की पुनर्गणना की गई।
अदालत ने दर्द एवं पीड़ा के लिए 15 लाख रुपये, परिचारक खर्च के लिए आठ लाख रुपये, चिकित्सा खर्च के लिए 35 लाख रुपये से अधिक, विशेष आहार, परिवहन खर्च, जीवन की सुविधाओं से वंचित होने तथा विशेष उपकरणों के लिए अलग-अलग मुआवजा प्रदान किया। अदालत ने कहा कि दुर्घटना के कारण पीड़ित सम्मानजनक और स्वतंत्र जीवन जीने की क्षमता खो बैठा था, जिसकी भरपाई केवल चिकित्सा खर्च से नहीं हो सकती। हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि घायल व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के बाद भी इलाज, दर्द एवं पीड़ा तथा अन्य खर्चों के मद में मिलने वाली राशि उसके कानूनी वारिसों को प्राप्त करने का अधिकार है, क्योंकि यह राशि उसकी संपत्ति का हिस्सा बन जाती है। इसी आधार पर अदालत ने बीमा कंपनियों और अन्य संबंधित पक्षों को बढ़ी हुई मुआवजा राशि दो महीने के भीतर जमा कराने का आदेश दिया।
