ग्रिड फैसले को लेकर विवाद में घिरे पंजाब बिजली बोर्ड के पूर्व CMD, FIR रद्द कराने हाई कोर्ट पहुंचे

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चंडीगढ़.

पंजाब स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड और पंजाब स्टेट पावर कार्पोरेशन लिमिटेड के पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक केडी चौधरी ने अपने खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार के मामले को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी है। 76 वर्षीय सेवानिवृत्त अधिकारी ने याचिका दाखिल कर विजिलेंस ब्यूरो की ओर से दर्ज एफआईआर को रद्द करने और मामले में आगे की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की है।

हालांकि उन्हें तत्काल राहत नहीं मिली और हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई आठ जुलाई तक स्थगित कर दी है। यह मामला वर्ष 2013 में लुधियाना के बसंत एवेन्यू क्षेत्र में 66 केवी ग्रिड सब-स्टेशन की स्थापना के लिए दी गई प्रशासनिक मंजूरी से जुड़ा है। विजिलेंस ब्यूरो का आरोप है कि ग्रिड निर्माण के दौरान विभागीय दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया गया। आरोपों के अनुसार ग्रिड के लिए निर्धारित न्यूनतम एक एकड़ भूमि और दो ग्रिड सब-स्टेशनों के बीच कम से कम पांच किलोमीटर की दूरी बनाए रखने की शर्तों का पालन नहीं किया गया। इसी आधार पर पूर्व सीएमडी समेत अन्य अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

केडी ने आरोपों को निराधार बताया
याचिका में केडी चौधरी ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार और तथ्यों के विपरीत बताया है। उनका कहना है कि बसंत एवेन्यू, दुगरी और आसपास के इलाकों में लगातार बढ़ रहे बिजली लोड, ओवरलोड ट्रांसफार्मरों और बार-बार बाधित हो रही बिजली आपूर्ति को देखते हुए क्षेत्रीय इंजीनियरों और फील्ड अधिकारियों ने वर्ष 2008 से ही नए ग्रिड सब-स्टेशन की आवश्यकता जताई थी। यह प्रस्ताव विभिन्न तकनीकी और प्रशासनिक स्तरों पर जांच के बाद अंतिम स्वीकृति के लिए उनके पास पहुंचा था। याचिका में कहा गया है कि जिन दिशा-निर्देशों के उल्लंघन का आरोप लगाया जा रहा है, वे कोई वैधानिक नियम नहीं बल्कि पुराने विभागीय दिशा-निर्देश हैं। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और भूमि की उपलब्धता की कमी को देखते हुए कई मामलों में ऐसे मानकों में छूट दी जाती रही है। चौधरी ने दावा किया कि उनकी सेवानिवृत्ति के बाद भी कम भूमि और कम दूरी वाले कई ग्रिड सब-स्टेशनों को मंजूरी दी गई।

दावा- एफआईआर में रिश्वत का जिक्र नहीं
पूर्व सीएमडी ने अदालत को यह भी बताया कि एफआईआर में कहीं भी यह आरोप नहीं लगाया गया कि उन्होंने रिश्वत ली, व्यक्तिगत लाभ प्राप्त किया या सरकारी खजाने को किसी प्रकार का वित्तीय नुकसान पहुंचाया। उनका तर्क है कि एक प्रशासनिक और तकनीकी निर्णय को आपराधिक रंग देकर कार्रवाई की गई है। याचिका में 13 वर्ष बाद एफआईआर दर्ज किए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं। चौधरी ने कहा कि इसी शिकायत की वर्ष 2018 और 2021 में जांच की जा चुकी है और दोनों बार मामले को बंद कर दिया गया था। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित भजन लाल बनाम हरियाणा राज्य मामले का हवाला देते हुए एफआईआर को दुर्भावनापूर्ण और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया है।

8 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने तत्काल कोई अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए सुनवाई आठ जुलाई तक स्थगित कर दी। अब इस मामले में अगली सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से रखी जाएंगी। फिलहाल यह मामला प्रशासनिक निर्णयों और आपराधिक जवाबदेही के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी बहस का विषय बन गया है।

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