तलाकशुदा बेटी को फैमिली पेंशन का हक? MP हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने बदली तस्वीर

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जबलपुर 

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह साफ कर दिया है कि तलाकशुदा बेटी भी पिता के परिवार का हिस्सा होती है और संपत्ति में भी उसका अधिकार है। हाईकोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ होम गार्ड्स के डायरेक्टर जनरल के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें एक रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट कमांडेंट की तलाकशुदा बेटी को फैमिली पेंशन के लिए उनकी नॉमिनी मानने से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट कहा है कि सरकारी कर्मचारी की तलाकशुदा बेटी को परिवार के सदस्य का दर्जा देने से इनकार करना, समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

जस्टिस विशाल धागत ने कहा कि जब एक शादीशुदा बेटी परिवार का सदस्य हो सकती है, तो एक तलाकशुदा बेटी क्यों नहीं हो सकती? यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के मामले पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर याचिकाकर्ता मृतक सरकारी कर्मचारी पर आश्रित थी तो फैमिली पेंशन के उसके आवेदन को मंजूर किया जाए। बेंच ने होमगार्ड्स डीजी से 90 दिन के अंदर इस संबंध में एक आदेश पारित करने को कहा है।

द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, होम गार्ड्स डीजी ने याचिकाकर्ता ज्योति श्रीवास्तव को उनके पिता शंकरलाल श्रीवास्तव की फैमिली पेंशन के लिए नॉमिनी मानने से इस आधार पर इनकार कर दिया था कि मध्य प्रदेश सिविल सेवा (पेंशन) नियम 1976 के मुताबिक तलाकशुदा बेटी कर्मचारी के परिवार का हिस्सा नहीं होती है।

याचिकाकर्ता के पिता शंकरलाल श्रीवास्तव का 2017 में निधन हो गया था। इसके बाद उनकी तलाकशुदा बेटी ज्योति ने फैमिली पेंशन पाने के लिए आवेदन किया था। होम गार्ड्स डीजी ने 16 दिसंबर 2021 को ज्योति के आवेदन को खारिज कर दिया था। डीजी के आदेश में कहा गया था कि पेंशन नियमों के अनुसार, एक तलाकशुदा बेटी कर्मचारी पर आश्रित नहीं होती है। इसके बाद ज्योति ने होमगार्ड्स डीजी के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

बेटियों को समान व्यवहार मिलना चाहिए
जस्टिस धागत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा, “पेंशन नियम 1976 के प्रावधानों को देखने पर यह पाया गया कि तलाकशुदा बेटी को परिवार की परिभाषा में शामिल नहीं किया गया है। हालांकि, विवाहित बेटियों को 1976 के पेंशन नियमों के नियम 44(5) के तहत परिवार की परिभाषा में शामिल किया गया है।”

बेंच ने कहा कि अविवाहित बेटी, विवाहित बेटी या तलाकशुदा बेटी के बीच कोई अंतर नहीं है। ऐसा करना अनुच्छेद 14 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

बेंच ने कहा कि यदि एक विवाहित बेटी को परिवार के सदस्य के रूप में शामिल किया जाता है, तो तलाकशुदा बेटी को परिवार की परिभाषा से बाहर रखने का कोई कारण नहीं है। जज ने कहा कि एक तलाकशुदा बेटी के साथ भी 1976 के नियमों के नियम 44(5) में बताई गई बेटियों के समान ही व्यवहार किया जाना चाहिए।

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