धरती की बुझी प्यास से दक्षिण पन्ना की झिरियों में फिर लौटी जैव-विविधता

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धरती की बुझी प्यास से दक्षिण पन्ना की झिरियों में फिर लौटी जैव-विविधता
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भोपाल

दक्षिण पन्ना वनमंडल की रैपुरा रेंज अंतर्गत भरतला बीट में स्थित रामडोल की झिरिया एवं दाने बाबा की झिरिया में जल गंगा संवर्धन अभियान में प्राकृतिक झिरियों की साफ-सफाई और मरम्मत का कार्य कराया गया। इसके परिणामस्वरूप इन झिरियों को पुनर्जीवन मिला और भीषण गर्मी में भी इनमें जल बना हुआ है। इससे झिरियों के आसपास के वन क्षेत्रों में वन्य पक्षियों की वापसी हुई है तथा क्षेत्र की जैव-विविधता पुनर्जीवित हो उठी है।

प्राकृतिक जल स्रोतों के आसपास बड़ी संख्या में मधुमक्खियों के छत्ते अब शहद से भरे दिखाई दे रहे हैं। पक्षियों के घोंसले फिर आबाद हो गए हैं और अन्य वन्यजीवों की सक्रियता भी बढ़ी है। वन क्षेत्र में दूधराज (एशियन पैराडाइज फ्लाईकैचर), ब्लैक-नैप्ड मोनार्क, किंगफिशर, बाज, उल्लू, मोर, हरियल तथा जंगली मुर्गा सहित अनेक पक्षी प्रजातियाँ विहार कर रही हैं। कई पक्षियों के घोंसलों में अंडे भी पाए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि यह क्षेत्र अब वन्यजीवों, स्थानीय तथा प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित एवं अनुकूल प्राकृतिक आवास बन गया है।

स्थानीय ग्रामीणों और वनकर्मियों ने बताया कि पिछली गर्मियों तक भीषण गर्मी के दौरान यहां की प्राकृतिक झिरियाँ सूख जाया करती थीं। जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत वन विभाग ने इन झिरियों की पहचान कर उनकी सफाई और मरम्मत कराई। वन विभाग के प्रयासों से इस वर्ष इन झिरियों में जल निरंतर प्रवाहित हो रहा है। जल स्रोतों से वन्यजीवों और पक्षियों को राहत मिल रही है। साथ ही मधुमक्खियों, तितलियों और अन्य छोटे जीवों के लिए भी यह वन क्षेत्र महत्वपूर्ण पारिस्थितिक आश्रय बन गया है।

जल संरक्षण और जैव-विविधता संरक्षण का यह समन्वित प्रयास दक्षिण पन्ना वनमंडल में प्राकृतिक संरक्षण के एक प्रभावी मॉडल के रूप में उभर कर सामने आया है।

 

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